19 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
संविधान निर्माण की राह में नेपाल में कई रोड़े
23-05-2012

काठमांडू। नेपाल में नए संविधान गठन की नजदीक आती तारीख के बावजूद इसकी अंतिम रूपरेखा को लेकर राजनेताओं में आम सहमति नहीं है। इस बीच संविधान सभा का सत्र मंगलवार को स्थगित कर दिया गया। नेपाल संसदीय सचिवालय ने विशेष परिस्थितियों का हवाला देते हुए संविधान सभा के सत्र को बुधवार तक के लिए स्थगित कर दिया। माना जा रहा है कि राज्यों के गठन के मसले पर देशभर में चल रही हड़तालों और प्रदर्शनों को देखते हुए यह फैसला लिया गया। देश में संविधान के अंतिम स्वरूप की घोषणा के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय 27 मई की तारीख में महज पांच दिन का समय है और इसका बढ़ता दबाव संविधान तैयार करने वाले राजनेताओं पर साफ तौर पर दिखने लगा है। 2006 में खत्म हुई राजशाही उल्लेखनीय है कि नेपाल में वर्ष 2006 में 200 वर्ष से भी अधिक समय से चली आ रही राजशाही का खात्मा हुआ था। इसके साथ ही राजतंत्र के खिलाफ दस वर्षो से हथियारबंद संघर्ष कर रहे माओवादी लड़ाके भी राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल हो गए थे। नेपाल के विभिन्न दलों के बीच इसके बाद से ही कभी भी कई अहम मुद्दों पर आम सहमति नहीं बन सकी है। कुछ वर्षो के अंतराल में ही इसे पुष्प कमल दहल प्रचंड, माधव नेपाल, झालानाथ खनल जैसे कई प्रधानमंत्रियों का उदय और अस्त देखना पड़ा है।हड़ताल का व्यापक असर आम जनता को परेशानी हो रही है, बल्कि पर्यटन उद्योग को भी खासा नुकसान पहुंचा है। हड़ताल के तीसरे और आखिरी दिन मंगलवार को भी स्कूल और बाजार बंद रहे। रविवार और सोमवार को हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिला था। परिवहन सेवाएं बाधित रही। हड़ताल का आह्वान कई जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाली फेडरेशन ऑफ इंडीजीनियस नेशनलीटिजने किया था। इसे माओवादियों से जुड़े जातीय समूहों का समर्थन भी प्राप्त है। जातीय समूह अधिक अधिकार और नए संविधान में प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं।सभी नियमों का पालन संभव नहीं संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष नीलांबर आचार्य ने कहा, इतने कम समय में सभी नियम कायदों का पालन करते हुए संविधान तैयार करना संभव नहीं है। समिति द्वारा मसौदा तैयार किए जाने के बाद इसे अनुमोदन के लिए संविधान सभा के पास भेजा जाएगा। संविधान सभा का चुनाव लोकतांत्रिक नेपाल के पहले संविधान को मूर्त रूप देने के लिए किया गया था। इसकी 601 सीटों में से 40 फीसदी पर नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सदस्य काबिज हैं। माओवादी जातीय आधार पर राज्यों के गठन के पक्षधर हैं। उनका कहना है कि इससे संघर्षरत समूहों का आंदोलन थम सकता है। हालांकि नेपाली कांग्रेस और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्‍सवादी लेनिनवादी) का कहना है कि जातीय आधार पर राज्यों के वर्गीकरण से देश की शांति व्यवस्था बिगड़ने का खतरा है।