19 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
सौ साल की सबसे बड़ी खोज
05-07-2012

जेनेवा। दिन बुधवार, तारीख 4 जुलाई 2012 विज्ञान की दुनिया में मील के पत्थर के तौर पर दर्ज हो गया है। स्विट्जरलैंड में यूरोपियन सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च [सर्न] के वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि गॉड पार्टिकल [ईश्वरीय कण] यानी हिग्स बोसोन की खोज कर ली गई है। इसे सौ साल की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। ब्रिटेन के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय परियोजना, लार्ज हैड्रन कोलाइडर [एलएचसी] पता लगाने में जुटी है कि जिस ब्रह्मांड में हम रहते है, वह महाविस्फोट [बिग बैंग] के साथ कैसे शुरू हुआ था।वैज्ञानिकों का दावा है कि इसी तत्व से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ था। साथ ही इससे पता चलेगा कि प्राथमिक कणों में द्रव्यमान का स्रोत क्या है।सर्न के महानिदेशक डॉ. रॉल्फ ह्यूर के मुताबिक, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि खोजा गया कण स्टैंडर्ड मॉडल के मुताबिक हिग्स बोसोन है या कोई एकदम नया कण। उनके मुताबिक अभी यह दावा नहीं किया जा सकता कि यह एक अलग कण है या अब तक नहीं खोजे जा सके कणों में पहला कण है। इस खोज से मौलिक पदार्थो की मूलभूत संरचना के सिद्धांत में बदलाव की गुंजाइश पैदा हो गई है।इन सभी तर्को के बावजूद डॉ. ह्यूर का मानना है कि उन्होंने हिग्स बोसोन को खोज लिया है। उन्होंने बताया कि इस कण का भार 125 अरब इलेक्ट्रॉन वोल्ट के बराबर है। ब्रिटेन की साइंस एंड टेक्नोलॉजी फैसिलिटी काउंसिल के मुख्य कार्यकारी जॉन वॉमर्सलि ने कहा, 'मैं दावा कर सकता हूं कि हिग्स बोसोन सिद्धांत के मुताबिक एक कण की खोज कर ली है। खोज में जुटी दो टीमों में से एक की प्रवक्ता जोइ इंकांडेल ने कहा कि खोज प्रारंभिक है, लेकिन इसके ठोस सुबूत मिले हैं। हिग्स बोसोन से सैद्धांतिक रूप से इतर ब्रह्मांड के निर्माण को समझना फिलहाल जटिल है। फिर भी इससे यह पता चल सकता है कि कण तारे, ग्रह और यहां तक की जीवन के निर्माण के लिए एक-दूसरे से कैसे जुड़ते हैं। निर्धारित स्टैंडर्ड मॉडल में अब तक गॉड पार्टिकल को ही नहीं खोजा जा सका था। अब इस पार्टिकल की खोज के बाद पता लग सकेगा कि जीव का उद्भव कैसे हुआ। यह कण, इस बात के लिए 48 वर्ष से की जा रही तलाश का विषय रहा है कि पदार्थ किस तरह अपना द्रव्यमान हासिल करता है। सर्न में सिद्धांतकार जॉन एलिस का कहना है कि नए कण की खोज करना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अब इसके गुणों के बारे में पता करना अहम होगा।डेढ़ सौ भारतीय वैज्ञानिकों के तप से मिली कामयाबी हम कौन हैं और कैसे व कहा से आए हैं? इंसान के सामने खड़े इस प्रश्न को सुलझाने की दिशा में दुनिया के वैज्ञानिकों ने एक अहम कदम बढ़ाया है। अलीगढ़ में जन्मीं और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ीं डॉ. अर्चना शर्मा स्विट्जरलैंड में चल रहे महाप्रयोग की कोर टीम में बतौर वरिष्ठ वैज्ञानिक काम कर रही हैं। जेनेवा में मौजूद डॉ. शर्मा से गॉड पार्टिकल के प्रयोग और कामयाबी को समझने का प्रयास किया गया। डॉ. शर्मा से प्रणय उपाध्याय की बातचीत के अंश सर्न के इस प्रयोग ने क्या साबित किया है? इस प्रयोग से हर वस्तु को वजन देने वाले कण का पता लगा है। लंबे समय से हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति का आधार ढूंढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। इस कड़ी में सबसे छोटे कणों की खोज शुरू हुई। तलाश की इस प्रक्रिया में हमने महाविस्फोट [बिग बैंग] के बाद ऊर्जा को घनत्व में बदलने वाले तत्व की खोज की। यह कण वजन देता है और इसके होने के कारण ही किसी भी दूसरे कण का अस्तित्व संभव है, इसलिए हम इसे गॉड पार्टिकल कह रहे हैं। सर्न के इस प्रयोग में भारत का कितना योगदान रहा?बोसोन नाम ही भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस केनाम पर रखा गया है। बोस और आइंस्टीन ने तत्व की एक विशेष अवस्था को समझाया था, जिसे बोस-आइंस्टीन कंडंस्टेट कहा गया। इसमें पाए जाने वाले कण एक खास तरीके से व्यवहार करते हैं, इसलिए उन्हें बोसोन कहा गया। भारत इस प्रयोग से लगातार जुड़ा रहा है। 1970 के दशक में हुए प्रयोगों में भी भारतीय वैज्ञानिकों का योगदान रहा है। वर्ष 2010 से जेनेवा में शुरू हुए लार्ज हैड्रन कोलाइडर प्रयोग में भारत के 150 वैज्ञानिकों का सीधा योगदान रहा है। भारत का टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, कोलकाता का साहा इंस्टीट्यूट, भाभा इंस्टीट्यूट ऑफ एटॉमिक एनर्जी, जम्मू विवि, दिल्ली विवि समेत कई संस्थाएं इससे जुड़ी रही हैं। कैसा है यह हिग्स बोसोन कण?जेनेवा में बना लार्ज हैड्रन कोलाइडर बोसोन दुनिया का सबसे ताकतवर साइक्लोट्रॉन है। इसमें प्रोटॉन को एक दूसरे से टकराया गया। प्रोटॉन के इस टकराव से बोसोन कणों के अस्तित्व की झलक मिली। बेहद तेज ऊर्जा की स्थिति में पैदा होने वाले इस कण का वजूद केवल क्षणिक होता है। इसलिए नैनो सेकेंड के भी बेहद छोटे हिस्से में इसके अस्तित्व को रिकॉर्ड किया गया। मेरी टीम ने इसके लिए खास डिटेक्टर तैयार किए थे। हिग्स बोसोन के अस्तित्व को सौ फीसद बताने से परहेज क्यों?इसकी मिसाल कुछ ऐसी हो सकती है कि हमें बालू के ढेर में किसी चट्टान विशेष से निकले कणों को खोजने के लिए कहा जाए। प्रयोग के दौरान हमें इस तरह के कण तो मिले, लेकिन जब तक इनके वजूद और गुणों को वैज्ञानिक प्रयोग से प्रमाणित नहीं किया जाए, उसे शत-प्रतिशत नहीं कहा जा सकता। क्या दुनिया के वजूद का आधार खोज लिया गया है?सीधे तौर पर कहना मुश्किल है, लेकिन प्रयोग ने दुनिया की उत्पत्ति और अस्तित्व को लेकर अब तक की वैज्ञानिक समझ की दिशा को सही साबित किया है। जिस तरह से अणु-परमाणु का अस्तित्व खोजा गया और कणों के घनत्व के आधार पर रासायनिक तत्वों की आवर्त सारिणी की तरह तत्व कणों का एक स्टैंडर्ड मॉडल तैयार किया गया, उसे ताजा प्रयोग ने सही साबित किया है।साकार हुआ सपना जेनेवा, प्रेट्र: सपने देखना और बात है, मगर सपनों को हकीकत में बदलते देखना कुछ सौभाग्यशाली लोगों को ही नसीब होता है। कुछ यही बात पीटर हिग्स पर भी लागू होती है, जिन्होंने गॉड पार्टिकल अथवा 'हिग्स बोसोन' कण से संबंधित सिद्धांत 1964 में प्रतिपादित किया था। ब्रिटिश वैज्ञानिक हिग्स भी बुधवार को जेनेवा में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद थे। गॉड पार्टिकल जैसे कणों की मौजूदगी के संकेत मिलने पर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और आंखों से आंसू छलक पडे़।इस मौके पर उन्होंने कहा, 'मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मैं अपने जीवन में ऐसी सफलता देख सकूंगा, जिसका मुझे पिछले चालीस साल से इंतजार था। जैसे ही गॉड पार्टिकल के संकेत मिले, मैंने अपने परिवार वालों को कहा कि तुरंत फ्रिज में कुछ शैंपेन रख दें।'हिग्स का गॉड पार्टिकल सिद्धांत हिग्स के मुताबिक गॉड पार्टिकल वह कण है जो पदार्थ को भार प्रदान करता है। यह ऐसा मूल कण है जो ब्रह्मांड में हर कहीं मौजूद है। जो इसे अपनी ऊर्जा से संचालित करता है। इस कण का अपना एक क्षेत्र है। इसके इलाके से गुजरने वाले दूसरे कणों को विरोध का सामना करना पड़ता है। जितना ज्यादा विरोध होगा, उतना ज्यादा उस कण का भार होगा।इसी को सिद्ध करने में जेनेवा में सर्न के वैज्ञानिक जुटे थे। सर्न के ताजा प्रयोग के जरिये वैज्ञानिकों को ऐसे कण की मौजूदगी के सुबूत मिलने में सफलता हासिल हुई है।