19 February 2019



राष्ट्रीय
राष्ट्रपति चुनाव के लिए मंच तैयार
19-07-2012

नई दिल्ली । राष्ट्रपति चुनाव के लिए मंच तैयार है। दो दावेदार मैदान में हैं। यूपीए से प्रणब मुखर्जी। एनडीए से पीए संगमा। कुल वोट 10,98,882 लाख हैं। वहीं जीतने वाले उम्मीदवार को 5,49,442 लाख वोट हासिल करने होंगे। ममता के समर्थन को हटाकर यूपीए की ओर से प्रणब मुखर्जी को 36.67 फीसद वोट मिलने की उम्मीद हैं। वहीं सपा व बीएसपी की ओर से प्रणब को 10.3 फीसद वोट मिलेंगे। जदयू व शिव सेना 5.5 के फीसद वोट। वहीं सीपीआईएम व फॉरवार्ड ब्लॉक की ओर से 3.7 फीसद वोट मिलने की उम्मीद हैं। प्रणब मुखर्जी को कुल 56.17 फीसद वोट मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। अब ममता भी प्रणब के पक्ष में आ गई हैं, लिहाजा यह प्रतिशत बढ़कर 65 पर पहुंच सकता है। दूसरी ओर संगमा को भाजपा की ओर से 21.2 फीसद वोट मिल सकते हैं। वहीं शिरोमणि अकाली दल की ओर से 1.1 फीसद व एआईएडीएमके का 3.3 फीसद वोट का समर्थन और बीजेडी की ओर से 2.8 फीसद वोट प्राप्त हो सकते हैं। संगमा को 31.7 फीसद कुल वोट मिल सकते हैं। सब कुछ जानते हुए भी, आंकड़ों का गणित समझने के बावजूद संगमा को अपनी जीत का भरोसा है। वह देश का पहला आदिवासी राष्ट्रपति बनने की चाह रखते हैं।प्रणब का सफरनामा एक आम आदमी से शिक्षक, वकील, प्रोफेसर, सांसद और फिर देश के वित्ता मंत्री बनने तक का सफर काफी उतार चढ़ाव भरा रहा। प्रणब मुखर्जी वर्तमान यूपीए सरकार में इससे पहले वित्ता मंत्री थे। राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद उन्होंने संगठन और सरकार से खुद को मुक्त कर दिया। एवं भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस के प्रमुख नेता है। उनका संसदीय प्रणब ने भारतीय राजनीति में अपने करीब पाच दशक के करियर में सब कुछ देखा। 1969 में काग्रेस पार्टी के राच्यसभा सदस्य के रूप में उच्च सदन से उन्होंने इस करियर की शुरुआत की थी। उन्हें कुल छह बार सासद चुना गया। 1975, 1981,1993 और 1999 में फिर से चुने गए। 1973 में वह औद्योगिक विकास विभाग के केंद्रीय उप मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल हुए। प्रणब वर्ष 1982 से 1984 तक कई कैबिनेट पदों के लिए चुने जाते रहे। इसके बाद वर्ष 1984 में वह पहली बार भारत के वित्ता मंत्री बने। वर्ष 1984 में ही यूरोमनी पत्रिका के एक सर्वेक्षण में उनको विश्व के सबसे अच्छे वित्ता मंत्री के रूप में मूल्याकित किया गया। प्रणब मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की उपाधि प्राप्त की। प्रणव इतिहास और राजनीति विज्ञान के छात्र रह चुके है। पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के किरनाहर शहर के निकट मिराती गाव में एक ब्राह्मंण परिवार में कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के बेटे के रूप में उनका जन्म हुआ। सिर्फ प्रणब ही नहीं बल्कि उनके पिता भी पहले से ही राजनीति में सक्रिय थे। उनके पिता 1920 से काग्रेस पार्टी में कार्यरत थे। पिता का हाथ पकड़ कर ही उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। प्रणव के पिता पश्चिम बंगाल विधान परिषद 1952-64 के सदस्य और वीरभूम पश्चिम बंगाल जिला काग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। उनके पिता एक सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन की खिलाफत के लिए 10 वर्षो से अधिक समय के लिए जेल भेजा गया था। इतिहास व राजनीति में डिग्री प्राप्त करने के बाद प्रणब ने एक कॉलेज प्राध्यापक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद एक पत्रकार के रूप में अपने करियर को आगे बढ़ाया। वर्ष 1984 में राजीव गाधी सरकार के कार्यकाल के दौरान पहली बार वित्ता मंत्री बने प्रणब ने पार्टी से मतभेदों के चलते अपनी अलग पार्टी राष्ट्रीय समाजवादी काग्रेस बना डाली, लेकिन बाद में वर्ष 1989 में राजीव गाधी के साथ समझौता होने के बाद काग्रेस पार्टी में ही प्रणब की पार्टी का विलय हो गया। तब उनका राजनीतिक करियर पुनर्जीवित हो गया। इसके बाद पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में चुन लिया। इसके बाद वह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के तौर पर नियुक्त किए गए। उन्होंने राव के मंत्रीमंडल में 1995 से 1996 तक पहली बार विदेश मंत्री के रूप में भी कार्य किया गया। 1997 में उन्हें उत्कृष्ट सासद चुना गया। वर्ष 1985 के बाद से वह काग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के भी अध्यक्ष बने। सन 2004 में जब काग्रेस ने गठबंधन सरकार के अगुआ के रूप में सरकार बनाई तो काग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सिर्फ एक राच्यसभा सासद ही थे। इसलिए जंगीपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र 7 जंगीपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतनेवाले प्रणव मुखर्जी को लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया। उन्हें रक्षा, वित्ता, विदेश विषयक मंत्रालय, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिच्य और उद्योग, समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री होने का गौरव भी हासिल हुआ। वह काग्रेस संसदीय दल और काग्रेस विधायक दल के नेता भी रह चुके है। साथ-साथ वह लोकसभा में सदन के नेता, बंगाल प्रदेश काग्रेस पार्टी के अध्यक्ष, काग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंत्रीपरिषद में केंद्रीय वित्ता मंत्रीज् रहे हैं। लोकसभा चुनावों से पहले जब प्रधानमंत्री ने बाई-पास सर्जरी कराई, प्रणब, विदेश मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद राजनैतिक मामलों की कैबिनेट समिति के अध्यक्ष और वित्ता मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री का अतिरिक्त प्रभार लेकर मंत्रिमंडल के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।संगमा का परिचय पूर्ण ऐजिटक संगमा पूर्व में वह मेघालय के मुख्यमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। संगमा राष्ट्रवादी काग्रेस पार्टी के सह-संस्थापक हैं। वह आठ बार लोकसभा सदस्य भी रह चुके हैं। पी ए संगमा का जन्म 1 सितंबर, 1947 को पश्चिम गारो हिल्स, मेघालय के चपाथी ग्राम में हुआ था। शिलाग से स्नातक डिग्री प्राप्त करने के बाद पी.ए. संगमा ने असम के डिब्रुगढ़ विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंध में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने एल.एल.बी. की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। वर्ष 1973 में पी.ए. संगमा प्रदेश युवा काग्रेस समिति के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। कुछ समय बाद ही वह इस समिति के महासचिव नियुक्त किए गए। 1975 से 1980 तक पी.ए. संगमा प्रदेश काग्रेस समिति के महासचिव रहे। वर्ष 1977 के लोकसभा चुनावों में पीए संगमा तुरा निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज करने के बाद पहली बार सासद बने। चौदहवीं लोकसभा चुनावों तक वह इस पद पर लगातार जीतते रहे। हालाकि नौवीं लोकसभा में वह जीत दर्ज करने में असफल रहे। वर्ष 1980-1988 तक पी.ए. संगमा केंद्रीय सरकार के अंतर्गत विभिन्न पदों पर कार्यरत रहे। वर्ष 1988-1991 तक वह मेघालय के मुख्यमंत्री भी रहे। काग्रेस में रहते हुए ही 1996 में वह दिन भी आया जब वह लोकसभा के अध्यक्ष के तौर पर चुने गए। उनकी बोलने का ढंग ही वहा मौजूद सासदों के चेहरों पर मुस्कान ला देती थी। वर्ष 1999 में काग्रेस से निष्कासित होने के बाद शरद पवार और तारिक अनवर के साथ मिलकर पी.ए. संगमा ने नेशनल काग्रेस पार्टी की स्थापना की। शरद पवार के भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गाधी से नजदीकी बढ़ जाने के कारण पी.ए. संगमा ने अपनी पार्टी का ममता बनर्जी की तृणमूल काग्रेस पार्टी में विलय कर नेशनलिस्ट तृणमूल काग्रेस की स्थापना की। 10 अक्टूबर, 2005 को अखिल भारतीय तृणमूल काग्रेस के सदस्य के तौर पर लोकसभा पद से इस्तीफा देने के बाद पी.ए.संगमा फरवरी 2006 में नेशनल काग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर संसद पहुंचे। 2008 के मेघालय विधानसभा चुनावों में भाग लेने के लिए उन्होंने चौदहवीं लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने के लिए पीए संगमा नेशनल काग्रेस पार्टी से इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल पार्टी सुप्रीमो शरद यादव नहीं चाहते थे कि वह प्रणब दा को इस पद के लिए चुनौती दें। लिहाजा उन्होंने संगमा को ऐसा न करने की हिदायत भी दी थी। लेकिन अपने सपने सच करने के लिए उन्होंने पार्टी से इस्तीफा देना ही उचित समझा। संगमा लोक सभा अध्यक्ष , सूचना और प्रसारण मंत्री (1995-1996), श्रम और रोजगार मंत्री (फरवरी 1995-सितंबर 1995), मेघालय के मुख्यमंत्री (6 फरवरी, 1988-25 मार्च, 1990) रह चुके हैं।इनके अलावा जिनका नाम रहा चर्चा में राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब के अलावा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, मौजूदा उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा, उद्योगपति रतन टाटा, अन्ना हजारे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम की जमकर चर्चा रही है। इससे पहले ममता बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, अब्दुल कलाम और प. बंगाल के पूर्व राच्यपाल गोपाल कृष्ण गाधी की उम्मीदवारी का समर्थन किया था।ऐसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव-भारत के राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के एकल संक्रमणीय मत पद्धति के द्वारा होत है। राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों और राच्य विधायिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा पाच वर्ष की अवधि के लिए चुना जाता है। पदधारकों को पुन: चुनाव में खड़े होने की अनुमति दी गई है। वोट आवंटित करने के लिए एक फार्मूला इस्तेमाल किया गया है ताकि हर राच्य की जनसंख्या और उस राच्य से विधानसभा के सदस्यों द्वारा वोट डालने की संख्या के बीच एक अनुपात रहे और राच्य विधानसभाओं के सदस्यों और राष्ट्रीय सासदों के बीच एक समानुपात बना रहे। अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो एक स्थापित प्रणाली है, जिससे हारने वाले उम्मीदवारों को प्रतियोगिता से हटा दिया जाता है और उनको मिले वोट अन्य उम्मीदवारों को तबतक हस्तातरित होता है, जबतक किसी एक को बहुमत नहीं मिलती।उपराष्ट्रपति को लोक सभा और राच्य सभा के सभी सदस्यों द्वारा एक सीधे मतदान द्वारा चुना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक हीं पद पर रह सकते हैं। अब तक केवल पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने ही इस पद पर दो कार्यकाल पूरे किए हैं।अपेक्षित योग्यताभारत का कोई नागरिक जिसकी उम्र 35 साल या अधिक हो वो उम्मीदवार हो सकता है। उम्मीदवार को लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता होना चाहिए और सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण नहीं करना चाहिए।एक नजर भारत के राष्ट्रपति परभारतीय सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति राष्ट्रपति के पास सिद्धात पर्याप्त शक्ति होती है, लेकिन अधिकाश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं। भारत के राष्ट्रपति दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन (रायसीना हिल)में रहते हैं। प्रतिभा पाटिल भारत की 12वीं तथा इस पद को सुशोभीत करने वाली पहली महिला राष्ट्रपति हैं। उन्होंने 25 जुलाई, 2007 को पद व गोपनीयता की शपथ ली थी।अब तक हुए भारतीय राष्ट्रपति 1.डॉ. राजेंद्र प्रसाद (जनवरी 1950-मई 1962)2.डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (मई 1962-मई 1967)3.डॉ. जाकिर हुसैन (मई 1967-मई 1969)4.वराहगिरि वेंकटगिरि (कार्यवाहक) (मई 1969-जुलाई 1969)5.न्यायमूर्ति मुहम्मद हिदायतुल्लाह (कार्यवाहक) (जुलाई 1969-अगस्त 1969)6.वराहगिरि वेंकटगिरि (अगस्त 1969-अगस्त 1974)7.फखरुद्दीन अली अहमद (अगस्त 1974-फरवरी 1977)8.बी.डी. जंट्टी (कार्यवाहक) (फरवरी 1977-जुलाई 1977)9.नीलम संजीव रेड्डी (जुलाई 1977-जुलाई 1982)10.ज्ञानी जैल सिंह (जुलाई 1982-जुलाई 1987)11.आर. वेंकटरमण (जुलाई 1987-जुलाई 1992)12.डॉ. शकर दयाल शर्मा (जुलाई 1992-जुलाई 1997)13.केआर नारायणन (जुलाई 1997-जुलाई 2002)14.डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (जुलाई 2002-जुलाई 2007)15.श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल (जुलाई 2007 से)