19 February 2019



राष्ट्रीय
ममता के यू-टर्न पर बंगाल में हैरानी
21-07-2012

कोलकाता। राष्ट्रपति चुनाव में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल काग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के अंतिम समय में नाटकीय यू-टर्न पर बंगाल में हैरानी व्यक्त की जा रही है। इसकी वजह ममता की वह इमेज है जिसमें वह एक बार फैसला करने के बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखती, लेकिन चार दशक के सियासी जीवन में यह पहला मौका है जब ममता को इतना कड़वा घूंट पीना पड़ा है। दरअसल, ममता ने जब राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी के विरोध को बंगाली सेंटीमेंट को ठेस पहुंचाने वाले फैसले के रूप में देखा गया। स्थितियों के मद्देनजर यह माना जाने लगा था कि ममता राष्ट्रपति चुनाव से किनारा कर सकती हैं, लेकिन आखिरी वक्त में तृणमूल सुप्रीमो ने रूख पलटते हुए प्रणब का समर्थन कर दिया।हमेशा अपने फैसलों पर अडिग रहने वाली ममता ने इस बार ऐसा क्यों किया? आखिर उनके सामने ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई थी? इसके जवाब में वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सब्यसाची राय बसु कहते हैं ममता ने प्रणब मुखर्जी का समर्थन करके जो किया, वह हम सबके लिए नया अनुभव है।उन्होंने इससे पहले कभी किसी मसले पर इतनी दूर बढ़ने के बाद कदम पीछे नहीं खींचे हैं। दूसरे राजनीतिक समीक्षकों के मुताबिक समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पालिटिकल बैक स्टैबिंग से आहत ममता इस मसले पर अलग-थलग पड़ गई थी। उनके पास दो ही विकल्प रह गए थे-प्रणब दा का समर्थन करना या राष्ट्रपति चुनाव से दूर रहना।राष्ट्रपति चुनाव से दूर रहने का मतलब था परोक्ष तौर पर प्रणब का समर्थन नहीं करना, इससे बंगाल के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती थी, जो देश में पहले बंगाली राष्ट्रपति की उम्मीद कर रहे थे।इसके अलावा भाजपा का राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी पी ए संगमा का समर्थन करना भी तृणमूल के लिए राजनीतिक तौर पर तर्कसंगत नहीं लग रहा था, क्योंकि इससे पार्टी के बंगाल में 26 फीसदी मुसलिम वोट बैंक को नुकसान पहुंचने का अंदेशा था। प्रदेश काग्रेस की तरफ से तृणमूल पर दबाव तेजी से बढ़ रहा था, वहीं वामदल भी दोनों दलों में व्याप्त मतभेद का राजनीतिक फायदा उठाने के फिराक में थे। ऐसे में ममता के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं रह गया था।प्रदेश काग्रेस नेता ओमप्रकाश मिश्रा ने कहा-तृणमूल ने हमारा इसलिए समर्थन किया, क्योंकि ममता काग्रेस की तरफ से उनकी पार्टी के खिलाफ चलाए गए आदोलन से घबरा गई थीं, जिसमें उनकी नीतियों को बंगाल विरोधी कहा गया है। राजनीतिक विश्लेषक सब्यसाची राय बसु मानते हैं कि ममता को इस बात का भी अंदेशा था कि उनकी पार्टी के कुछ सासद व विधायक गुपचुप तरीके से प्रणब का समर्थन करेंगे, क्योंकि उनका तृणमूल के अधिकाश नेताओं के साथ काफी अच्छे संबंध हैं।सुब्रत मुखर्जी कहते हैं कि तृणमूल एक जिम्मेदार और विश्वनीय राजनीतिक दल है। राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी का समर्थन करना राजनीतिक निर्णय था। कुछ राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि जब राजनीतिक आकड़े प्रणब का समर्थन कर रहे हैं, तो संप्रग के साथ संबंधों को और बिगाड़ने का कोई तुक नहीं था, क्योंकि आर्थिक संकट से जूझ रही ममता सरकार को केंद्र से मदद की बेहद जरुरत है, लेकिन यह तो है कि बाध्य होकर समर्थन करने की वजह से ममता के बार्गेनिंग पावर पर जरूर असर पड़ेगा।माकपा की केंद्रीय कमेटी के सदस्य नीलोत्पल बसु ने कहा-इस पूरे प्रकरण से ममता का दोहरा मानदंड सबके सामने आ गया है। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के लिए नामाकन पत्र जमा देने के बाद से ही साफ तौर पर लग रहा था कि वही जीतेंगे। अगर कोई सवाल था तो बस यही कि वह कितने प्रतिशत वोटों से जीतेंगे।