16 February 2019



राष्ट्रीय
पवार सूखे से निपटने की बजाय सियासी खेल में उलझे
24-07-2012

नई दिल्ली। मानसून की बेरुखी ने खाद्य पदार्थो की कीमतों में इतनी वृद्धि कर दी है कि महंगाई सिर चढ़ कर बोलने लगी है। जहां महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान में बारिश में आई सुस्ती की वजह से किसान त्रस्त हुए पड़े हैं वहीं कृषि मंत्री शरद पवार इस स्थिति से निपटने की बजाय अपनी सियासत संभालने में जुटे हुए हैं।गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले कृषि मंत्री ने कहा था कि भले ही मानसून लुका छिपी का खेल खेल रहा है, लेकिन हमारा देश सूखे से निपटने के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकारा था कि अगर मानसून की मात्रा कम रही तो किसानों के लिए पिछले दो साल के खाद्यान्न उत्पादन के रिकार्ड को तोड़ना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा और आखिरकार वहीं होता हुआ नजर आ रहा है। अब तक मानसून सीजन में 22 फीसद बारिश कम हुई है। जिसकी वजह से पूरे देश में सूखे की स्थिति आ गई है। धान और कई अनाजों की बुवाई इससे प्रभावित हुई है। ऐसे में महंगाई का सिर चढ़कर बोलना और खाद्य पदार्थ, सब्जियों की कीमतों में इजाफा होना जायज है।जहां कृषि मंत्री को सूखे से निपटने के लिए कोई ठोस रास्ता निकालना चाहिए वहां वह पिछले पांच दिनों से मंत्रालय ही नहीं जा रहे हैं। वह संप्रग सरकार संग पावर गेम खेलने में जुटे हुए हैं। जहां एक तरफ पूरा देश महंगाई की मार झेल रहा है वहीं पवार को अपने मंत्रालय के कामकाज की कोई चिंता ही नहीं है। मंत्री साहब फिलहाल संप्रग सरकार संग अपने रिश्ते की खींचतान को लेकर व्यस्त हैं। पवार का गुस्सा बरकरार राकापा के संप्रग में रहने या न रहने का फैसला अगले एक-दो दिन के लिए टल गया है, लेकिन गठबंधन से संकट के बादल अभी छंटे नहीं है। सोमवार को हुई राकापा की बैठक में कोई फैसला नहीं हुआ। हालाकि शरद पवार का गुस्सा बरकरार है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की विदाई के मौके पर प्रधानमंत्री की तरफ से आयोजित भोज का पवार व उनकी टीम ने बहिष्कार किया। राकापा के मंत्रियों ने सरकारी गाड़ी भी मंत्रालयों को वापस कर दी है। सोमवार को राष्ट्रपति निर्वाचित होने पर प्रणब मुखर्जी को बधाई देने भी पवार अपनी निजी कार से गए।सूत्रों के मुताबिक, काग्रेस और राकापा के बीच संकट के समाधान पर बातचीत जारी है। काग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि गठबंधन में ऐसी बातें होती रहती हैं। आम तौर से ऐसी बातों का हल बातचीत से निकल आता है। सूत्रों के मुताबिक, विवाद की असली जड़ महाराष्ट्र से जुड़े विषय और काग्रेस नेताओं की बयानबाजी है। खास तौर से राकापा, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण से बेहद नाराज है। उन सब विषयों पर काग्रेस-राकापा के बीच परदे के पीछे से वार्ता जारी है। इस बातचीत का ही नतीजा था कि राकापा ने दिल्ली में हुई बैठक का फैसला टाल दिया है।विवाद का पूरा केंद्र दिल्ली के बजाय महाराष्ट्र स्थानातरित हो गया है। अब मंगलवार को राकापा की बैठक पुणे में होगी और बुधवार तक वह फैसला सुना सकती है। सोमवार की बैठक के बाद राकापा नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि एक-दो दिन में आखिरी फैसला हो जाएगा। अंतिम फैसले से पहले राकापा महाराष्ट्र के नेताओं के साथ एक और बैठक करेगी। पटेल इस सवाल से कन्नी काट गए कि वे संप्रग सरकार में शामिल हैं या बाहर से समर्थन दे रहे हैं। पटेल ने कहा कि हम संप्रग के सहयोगी हैं और 2014 तक साथ रहेंगे। महाराष्ट्र में भी काग्रेस के साथ रहेंगे। हालाकि, किस स्वरूप में रहेंगे यानी बाहर से समर्थन देंगे या सरकार में शामिल रहेंगे, इस पर अपने पत्तो नहीं खोले। उन्होंने काग्रेस के कुछ नेताओं पर राकापा को बदनाम करने का आरोप लगाया। साथ ही काग्रेस आलाकमान से नेताओं की बयानबाजी पर रोक लगाने की अपील भी की। जब पटेल से निजी गाड़ी में प्रणब से मिलने जाने और प्रधानमंत्री के भोज में नहीं जाने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि ये हमारा फैसला है। जब तक हम काम नहीं करेंगे, तब तक हम सरकारी साधनों का इस्तेमाल नहीं करेंगे और न ही किसी सरकारी कार्यक्रम में शरीक होंगे।