19 February 2019



राष्ट्रीय
सजा के प्रारूप में हो बदलाव
02-08-2012

नई दिल्ली। राकेश कुमार। दक्षिण दिल्ली में अपना शोरूम। एक साथी के यहां गए। रास्ते में ही सिगरेट पीने लगे। पास में पार्क था। वहां बच्चे खेल रहे थे। इसी दौरान चालान करने में सक्षम एक अधिकारी की कार वहां से गुजरी। राकेश से जब सार्वजनिक जगह पर सिगरेट न पीने के कानून का जिक्र किया तो दोनों में वाद-विवाद हो गया। अधिकारी ने पेशी का नोटिस थमाते हुए उन्हें अपना परिचय दिया। राकेश ने तुरंत गलती मानी। कहा, परिजनों और बच्चों के सामने गलत आदर्श पेश नहीं करना चाहते। इसलिए बाहर कभी-कभी सिगरेट पी लेते हैं। वे ऐसी सजा के लिए तैयार थे जो सामाजिक हो। अगले दिन उस अधिकारी के साथ सिगरेट पीने वालों के चालान में सहयोग किया।मोहन लाल। सजा-शराब पीकर ऑटो चलाने के आरोप में 7 दिन की जेल। पुनर्समीक्षा याचिका दायर की। कहा कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं। जेल के बजाय सामाजिक सेवा की सजा देने की अपील की। अदालत ने दक्षिण पश्चिम जिला यातायात पुलिस उपायुक्त के निर्देशानुसार पांच दिन ट्रैफिक संचालन में मदद का निर्देश दिया।अमित (परिवर्तित)। पेशा-कारोबार। एमए की शिक्षा। रात में नशे में कार चलाते हुए पाए गए। पेशी पर कहा कि दोस्त के घर पार्टी थी। थोड़ी पी थी, लेकिन जेल नहीं जाना चाहते हैं। पुलिसकर्मियों के साथ रात को शराब पिए चालकों से निपटने की सजा मिली। ये कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि अगर अदालत-सरकार-सक्षम प्राधिकरण चाहें तो छोटे अपराध के लिए सामाजिक सेवा जैसी सजा देकर न सिर्फ जेल का बोझ कम कर सकते हैं बल्कि आम लोगों को कानून का सम्मान करने की सीख भी दे सकते हैं। देर से ही सही, लेकिन सरकार को भी ऐसे मामलों में मध्यम मार्ग अपनाने का विकल्प मुफीद नजर आने लगा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल में ही सभी राज्यों को सलाह दी है कि छोटे अपराध के लिए बड़ी सजादेने की जगह आरोपी को सामाजिक सेवा की सजा देने की कोशिश की जाए। ताकि ऐसे लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड भी न खुले और वे जेल जाकर हार्ड-कोर अपराधी बनने की जगह सामाजिक सेवा की सजा से मुख्यधारा में बने रहें। राज्यों से कहा गया है कि वे इस तरह की कवायद करें जिससे छोटी चोरी, ट्रैफिक नियम उल्लंघन के साथ ही अन्य मामूली मामलों में आरोपी को सीधे जेल की सजा देने की जगह एक बार सामाजिक सेवा की सजा दी जाए। जेलों में हैं क्षमता से अधिक कैदी दरअसल, मंत्रालय की इस कवायद की एक वजह देश की जेलों में कैदियों की संख्या का क्षमता से 15.1 प्रतिशत से अधिक होना भी है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के वर्ष 2010 के आंकड़ों के मुताबिक, देश की 1393 जेल में 320450 की क्षमता के विपरीत 368998 बंदी थे। एक अन्य वजह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष केजी बालकृष्णन का सुझाव भी है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश बालकृष्णन ने कहा है कि ऐसे गरीब आरोपी-अपराधी जिन्होंने बड़े अपराध नहीं किए हैं और जिन्हें जमानत मिल जाती है लेकिन जमानती न होने की वजह से जो जेल में ही रह जाते हैं, उन्हें बाहर निकालने के लिए व्यक्तिगत बांड भरने की सुविधा दी जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि कई ऐसे मामले हैं जिनमें सुनवाई लंबे समय तक चलती है, लेकिन अंत में व्यक्ति बरी करार दे दिया जाता है।