21 February 2019



मनोरंजन
बदलना चाहता है हिंदुस्तान
13-08-2012

सत्यमेव जयते का ढाई साल का अनुभव मुझे समृद्ध कर गया है। टीम के शोध ने मुझे नई जानकारियां दीं। इन सब चीजों के बारे में इतनी गहराई और विस्तार से मैं नहीं जानता था। सभी खास मुद्दों पर मेरी खुद की जानकारी बढ़ी। इसके अलावा इस शो में देश के कोने-कोने से आए लोगों को मैंने करीब से सुना और देखा।

जिंदगी के आईने में देश

हर एपीसोड में 15-20 गेस्ट रहते थे। वे बड़े शहरों से लेकर दूर-दराज के देहातों तक से आए थे। सब की भाषा अलग थी, लहजा अलग था। मैंने उन सभी से गहरी और अंतरंग बात की है। हर एपीसोड की शूटिंग में पूरा दिन लग जाता था। शो के विषयों के अलावा भी उनसे बातें होती थीं। उनकी जिंदगी के आईने में मैंने देश को देखा। टीवी पर भले ही बातचीत दो-चार मिनट की दिखाई पड़ती हो, लेकिन वास्तव में हमने घंटे-घंटे भर बात की है। मैं उन्हें तफसील और गहराई से सुनता था। उनके अनुभवों ने मुझे देश के और करीब ला दिया है। लोगों को ज्यादा नजदीक से समझ सका।

अन्याय से था अनजान

सत्यमेव जयते के 13 एपीसोड खत्म करने के बाद अगर मेरी राय पूछें, तो मैं अभी उसे कायम नहीं कर सका हूं। हर एपीसोड को समझने, देखने और तैयार करने में एक हफ्ता लगता था। इस एक हफ्ते में मैं अनेक अनुभवों से गुजरता था। किसी एक की कहानी सुनते समय मैं चौंकता था कि ऐसा कैसे हो सकता है? कोई इंसान दूसरे इंसान के साथ ऐसा कैसे कर सकता है? क्या हम सभी असंवेदनशील हो गए हैं?

मैं बेचारगी और शर्म महसूस करता था। मुझे लगता था कि मेरे आसपास ऐसा अन्याय हो रहा है और मैं अभी तक उससे नावाकिफ हूं। देश की सोच और समझ से मायूसी होती थी, लेकिन उसी के साथ-साथ उम्मीद के उदाहरण भी मिलते थे।

लोगों में है सकारात्मक सोच

इस शो से ही मैं समझ पाया कि इसी समाज में ऐसे लोग भी हैं, जो देश और समाज की बेहतरी और भलाई के लिए सोचते हैं। वे संवेदनशील, हिम्मती, भावपूर्ण और सकारात्मक हैं। इस शो को मिले रिस्पॉन्स से मैं हतप्रभ हूं। शुरुआत में लोगों ने हतोत्साहित किया कि सामाजिक मुद्दों पर बने शो को कौन देखेगा? कौन अपने भाव कुरेदना चाहेगा? कौन दुख-दर्द के किस्से सुनेगा? शो खत्म होने के बाद मैं कह सकता हूं कि हमारे दर्शक सिर्फ नाच-गाना और गेम शो ही नहीं देखना चाहते हैं। उनकी प्रतिक्रियाओं की तादाद से मैं दंग हूं।

युवाओं में है छटपटाहट

एक चीज तो स्पष्ट है कि हिंदुस्तान बदलना चाहता है। खासकर देश का युवा वर्ग तब्दीली के लिए छटपटा रहा है। उम्मीद की लौ अभी बुझी नहीं है। हमें मूसलाधार प्रतिक्रियाएं मिली हैं। हमने सत्यमेव जयते को मिले सारे रिस्पॉन्स एक संस्था को दिए और उनसे निष्कर्ष देने के लिए कहा। आप यकीन नहीं करेंगे कि एक अरब से ज्यादा प्रतिक्रियाएं आई हैं।

उस संस्था ने उन प्रतिक्रियाओं के सार के रूप में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिया। वह निष्कर्ष सभी प्रतिक्रियाओं की केंद्रीय आंतरिक सोच को जाहिर करता है और वह सोच है, मैं अकेला नहीं हूं। कमाल का विचार है यह। हम सभी मानते हैं कि हम अकेले क्या कर सकते हैं? इस अनुभव से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि कोई अकेला नहीं है। बस, आगे बढ़ने की जरूरत है। लोग साथ आ जाएंगे।