19 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
पाकिस्तान की किताबों में बढ़े जहर के पन्ने
05-09-2012
कहते हैं कि किताबें सच्ची दोस्त होती हैं और किताबें ज्ञान का भंडार होती हैं, लेकिन पाकिस्तान के स्कूलों में बच्चों को जो पाठ्य-पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं, वे तो उनकी दुश्मन साबित हो रही है। इन पुस्तकों में हिंदू, सिख, ईसाई और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों और संप्रदायों के खिलाफ जहर उगला गया है। समझदार लोग चिंतित हैं कि आखिर ये बच्चे कैसी दूषित दृष्टि के सहारे आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात तो यह है कि समय के साथ इन पुस्तकों में घृणा और वैमनस्य फैलानी वाली सामग्री कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। पंजाब और सिंध प्रांत में छह से बारहवीं तक की पुस्तकों के अध्ययन के बाद नेशनल कमीशन फॉर जस्टिस एंड पीस नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने यह निष्कर्ष निकाला है। इन पुस्तकों के जरिए अल्पसंख्यकों के अलावा भारत और पश्चिमी देशों के प्रति भी बच्चों में नफरत भरी जा रही है। संस्था का कहना है कि कई ऐसी पाठ्य पुस्तकें भी हैं जिनमें पहले घृणा फैलाने वाली कोई सामग्री नहीं थी, लेकिन अब उनमें उन्हीं सामग्रियों की भरमार है। पंजाब में 2009-11 के दौरान प्रकाशित पाठ्य पुस्तकों में नफरत फैलाने वाली 45 पंक्तियां थी। अब उनकी संख्या 122 हो गई है। सातवीं से दसवीं तक की उर्दू की पाठ्य पुस्तकों ने इस मामले में रिकॉर्ड बनाया है। पहले उन पुस्तकों में घृणा फैलाने वाली 15 लाइनें थी, जो बढ़कर 86 हो गई हैं। 2009 में नौवीं और दसवीं की उर्दू की किताबों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं कहा गया था, लेकिन ताजा संस्करण में ऐसी बातें भरी पड़ी हैं। कुल मिलाकर, प्राथमिक से माध्यमिक तक के 22 पाठ नफरत के जहर से भरे हुए हैं। मानवाधिकार और नागरिक संगठन पाठ्य पुस्तकों की इन्हीं सामग्रियों को यहां अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा भारत के खिलाफ दुश्मनी के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं।