24 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
1962 का युद्ध: विश्वासघात या कायरता
18-10-2012
कोई भी व्यक्ति, जो मेरी तरह हिमालय की ऊँचाइयों में चीन के साथ अल्पकालिक लेकिन कटु सीमा युद्ध का साक्षी है, वो आधी सदी के बाद भी सदमा भूला नहीं है, जिसमें भारत की सैन्य पराजय हुई थी और वो राजनीतिक विफलता भी थी. इस युद्ध के इतिहास को इतनी बारीकी से लिखा गया है कि उस ज़मीन पर दोबारा चलने की आवश्यकता नहीं, जिस पर इतनी अच्छी तरह से काम हुआ है. ये कहना पर्याप्त होगा जैसा जवाहर लाल नेहरू के आधिकारिक आत्मकथा लिखने वाले एस गोपाल ने लिखा था- चीज़ें इतनी बुरी तरह ग़लत हुईं कि अगर ऐसा वाक़ई में नहीं होता, तो उन पर यक़ीन करना मुश्किल होता. लेकिन ऐसा इतना हुआ कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने अपनी सरकार पर आसानी से विश्वास करने और अनदेखी का आरोप लगा दिया.