22 February 2019



राष्ट्रीय
बेबसी की चीख नहीं हक की हुंकार
22-12-2012
गुजरात की बादशाहत, हिमाचल का ताज। सब तुमको मुबारक। कौन करेगा दिल्ली पर राज? किसका जाएगा ताज? यह जानने की भी नहीं हमें जरूरत। अपने अभेद्य किलेनुमा मकानों। हजारों-लाखों शस्त्रधारी सुरक्षाकर्मियों की गारद। पुलिस बेरीकेडिंग के घेरों में सुरक्षित-संरक्षित हुक्मरानों मगर क्या आप देख नहीं रहे.? आप सत्ता में हैं और विपक्ष में भी। मगर सियासी दलों की रहनुमाई में जनता का भरोसा नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ उसके आक्रोश ने खुद ही रास्ता बनाया। अब अपनी मां, बहनों और बच्चियों की अस्मत-आबरू और जिंदगी के लिए वही जनता खुद अपनी रहनुमा है। मगर यह जनता कुछ ज्यादा खास है। महज प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक सीमित नहीं, बल्कि आक्त्रोशित और आक्रामक जनसैलाब है यह। पांच साल की बच्ची अनन्या से लेकर 70 साल की वृद्धा मंजीत कौर तक। सब अपनी सुरक्षा के लिए सड़कों पर हैं। रविवार की रात राजधानी में दरिंदगी की शिकार की लड़की सफदरजंग में मौत और बेइंतिहा दर्द से लड़ रही है। वह मौत से जीती तो एक ऐसी वीभत्स और अधूरी जिंदगी उसे हासिल होगी, जिसकी कल्पना भी सिहराती है। इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन उमड़ा यह जनसैलाब वास्तव में अपनी बच्चियों की घर से लेकर सड़क तक असुरक्षित और डरी, दर्द भरी और आधी-अधूरी जिंदगी के खिलाफ है। उसका मकसद सिर्फ ऐसे वहशियों के खिलाफ प्रतिशोध नहीं है। फांसी वह किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रति ऐसी हिंसक सोच रखने वाली मानसिकता को देना चाहती है। क्षोभ और आक्रोश से भरे पांच साल की बच्चियों से लेकर टीन एजर्स और युवा लड़कियों के चेहरे सिर्फ इस एक घटना का परिणाम नहीं हैं। कभी कोख में मरने तो कभी तालिबानी खापों के तुगलकी फैसलों का सितम। फिर घर, स्कूल, कालेज, दफ्तर, बस और सड़क सब जगह आशंका और अविश्वास के बीच झूलती लड़कियां अब बेबसी की चीख से निजात चाहती हैं। वे अब सड़कों पर दहाड़ रही हैं। उनके भाई-बंधु और दोस्त भी साथ हैं। तथाकथित सभ्य समाज में निर्भय होकर जीने की इस न्यायसंगत और मानवीय चाहत को सरकार शक्ति से दबाने की कोशिश कर रही है। रायसीना हिल्स यानी हिंदुस्तान की सत्ता के शिखर पहाड़ी से औरतों के खिलाफ दरिंदगी रोकने की मांग करने वालों पर पानी की तेज बौछारें, आंसू गैस के गोले और लाठियां छोड़ी जा रही हैं। राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय वाला साउथ ब्लाक और गृह मंत्री वाले नॉर्थ ब्लॉक और बगल में संसद। मगर जनता से सीधे बात करने का साहस किसी में नहीं। वरना तो रविवार को लड़की के साथ हुई अमानवीयता पर इसी संसद ने अभी चार दिन पहले ही तो घड़ों आंसू बहाए थे। क्या सत्ता पक्ष और क्या विपक्ष सभी अपनी-अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित था। फांसी और कड़े कानूनों की मांग हुई। मगर अपनी बहनों-बेटियों की सुरक्षा को चिंतित आम आदमी उनको खतरा लग रहा है? संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी पीड़िता से मिलने पहुंचीं। तब तक मौन रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस घटना पर दुख भी इसके बाद ही जताया। नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने सदन में तो फांसी की मांग की। मगर बस वह सदन तक ही रह गई और गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे समेत पूरा सरकारी अमला दिल्ली पुलिस की पीठ ठोकता नजर आया। ऐसे में सियासतदान जनता को बुझते हुए चंद बासी चिराग से ज्यादा कुछ नहीं दिख रहे। अब तक सोई हकीकत की दुनिया अब करवट ले रही है। अब लाम पर आ चुके आम आदमी की जलती उम्मीदों के बीच सियासत बसेरा ढूढ़ने की अजीबोगरीब कोशिश कर रही है। मगर उसके पास अमेरिका के साथ नाभिकीय करार या एफडीआई को पारित कराने जैसा कोई प्रबंधन या इच्छाशक्ति नजर नहीं आती और न ही 2जी पर जेपीसी की मांग के लिए सत्ता पक्ष को झुकाने वाली विपक्षी एकजुटता के जनता को दर्शन हो रहे हैं।