22 February 2019



राष्ट्रीय
चलती बस में गैंगरेप: छठा आरोपी बिहार से गिरफ्तार
22-12-2012
दिल्ली में पैरामेडिकल की छात्रा के साथ हुए दुष्कर्म मामले का छठा आरोपी अक्षय ठाकुर शुक्रवार को बिहार के औरंगाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके साथ ही दिल्ली पुलिस इस दुष्कर्म में शामिल सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। इससे पहले दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी। हालांकि कोर्ट पुलिस की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं है तथा उसे नौ जनवरी तक मामले की विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। इसी बीच सूचना मिली है कि पीड़िता की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है तथा वह कुछ बोलने की भी कोशिश कर रही है। हालांकि, लाखों देशवासियों की दुआएं, डॉक्टरों के अथक प्रयास व मजबूत इच्छाशक्ति के सहारे गैंगरेप पीड़ित युवती घटना के छठे दिन खुद से सांस लेने व बोलने का प्रयास कर रही है। जब उसकी आवाज निकली तो सबसे पहले मां कहकर उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की। युवती को वेंटिलेटर से हटा लिया गया है, पर अभी भी उसे ऑक्सीजन दी जा रही है। हालांकि इलाज कर रहे डॉक्टर इस सुधार को दीर्घकालिक नहीं मान रहे क्योंकि संक्रमण उसके पूरे शरीर में फैलता जा रहा है। सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बीडी अथानी ने कहा कि शुक्रवार को पीड़िता के स्वास्थ्य में मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। उसके स्वास्थ बिगड़ने का संकेत यह है कि शरीर में संक्रमण घटने के बजाय बढ़ रहा है। इस वजह से उसके खून में सफेद रक्त कण [डब्ल्यूबीसी] घटकर 1500 रह गया है, जोकि 4,300 से 10,800 के बीच होना चाहिए। दोपहर बाद प्लेटिलेट्स में कुछ सुधार हुआ और वह 61 हजार हो गया है। यह अब भी सामान्य से बहुत कम है। संक्रमण पूरे शरीर व खून में फैल गया है। एंटिबायोटिक्स का असर नहीं हो रहा। अब संक्रमण बोन मैरो [मज्जा] को प्रभावित करने लगा है। बोन मैरो हड्डियों के बीच मौजूद होता है, जिसके चलते हड्डियों में मजबूती व लचीलापन बना रहता है। बोली दादी, उन्हें कभी माफ न करना. दिल्ली में गैंगरेप की घटना के बाद मेड़ौराकला गांव में मातमी सन्नाटा है। पीड़ित युवती के घर के पुरुष सदस्य दो दिन पूर्व ही दिल्ली चले गए। घर पर 75 वर्षीय दादी, चाची व चचेरी बहन हैं। दादी कहती हैं कि भूख-प्यास सब मिट गई है। बच्ची बच जाए ईश्वर से यही प्रार्थना है। बदमाशों को कभी माफ न करना.। चाची व चचेरी बहन की भी यही स्थिति थी। दोनों फफक-फफक कर रो रही हैं। घरवालों को यह मनहूस खबर मंगलवार दोपहर मिली। युवती के पिता 25 वर्ष से दिल्ली में रह रहे हैं। उनके दो पुत्र व एक पुत्री हैं। चार भाइयों में वे तीसरे नंबर पर हैं। गांव वालों ने दुराचारियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की है।

आंखों में सपने, सपने बेहतर भविष्य के, सपने घर की अच्छी आर्थिक हालत के, सपने भाइयों को पढ़ाने लिखाने के, सपने मां-बाप को अच्छी जिंदगी देने के। जी हां, इन ही सपनों ने उसे दिल्ली की राह दिखाई थी, न कि माता-पिता की आर्थिक हैसियत ने। क्योंकि उसके पापा की बेहद मामूली सी नौकरी में बस किसी तरह मां बाप और दो छोटे भाईयों का पेट भर पाता है। वो घर की बेटी नहीं, बेटा थी। तभी तो पूरे परिवार की उम्मीद उससे जुड़ी थी। पीड़िता के पिता के मुताबिक घरवालों ने आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए हंसना अपनी बेटी से सीखा, वो बेहद खुशमिजाज थी। मुश्किल में भी हंसना उसे आता था। हालात का निर्भीकता से सामना करती रही है वो। अस्पताल के बिस्तर पर वो जिंदगी की जंग लड़ रही है और जिंदगी हर पल उसका इम्तिहान ले रही है। वैसे उसकी हिम्मत, हौसले और जज्बे के पीछे उसके पिता का रोल भी कम नहीं। \'दुष्कर्मी को फांसी आखिरी समाधान नहीं\' मुंबई। नई दिल्ली में फिजियोथेरेपिस्ट लड़की का सामूहिक दुष्कर्म करने वालों को फांसी देने की उठ रही मांग के बीच बांबे हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर धर्माधिकारी ने शुक्रवार को कहा कि फांसी की सजा आखिरी समाधान नहीं है। उन्होंने कहा, दुष्कर्म के आरोपियों को फांसी की सजा की मांग लोग गुस्से के कारण कर रहे हैं। यह तत्कालिक प्रतिक्रिया है और ऐसी प्रतिक्रियाएं तीव्र होती हैं। पूर्व न्यायाधीश ने कहा, \'फांसी की सजा अंतिम समाधान नहीं है। समस्या के बारे में लोगों को जागरूक करना ही इसका हल है। जो दिल्ली में हुआ वह मुंबई में भी हो रहा है।\' धर्माधिकारी ने कहा कि कानून व्यवस्था में सजा के डर से ज्यादा कानून का सम्मान करना जरूरी है। उन्होंने कहा, \'मैं आश्चर्यचकित हूं कि प्रभावी तंत्र के बावजूद ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं। मेट्रोपालिटन शहरों में लड़की की सुरक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, मेरी पीड़ा सिर्फ मेरे बच्चों को लेकर नहीं है। मैं अपने नाती-पोतों और परपोतों को लेकर चिंतित हूं।

बलात्कारी को सख्त सजा पर बहस, सरकार ठिठकी- [माला दीक्षित]। गैंग रेप में सजा को लेकर नई बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि न्याय के लिए समाज की पुकार और सजा में समाज की घृणा दिखनी चाहिए। सड़क पर उतरे लोग सख्त सजा की मांग भी कर रहे हैं, लेकिन सख्ती का पैमाना क्या हो, इस पर सरकार का असमंजस बढ़ रहा है। गैंग रेप के मामले में सरकार ने कानून को कठोर करने का संकेत शुक्रवार को फिर दिया, लेकिन फांसी या मौत की सजा के प्रावधान पर चुप्पी कायम है। गैंग रेप के खिलाफ मौजूदा कानून सिर्फ उम्रकैद की बात करता है जबकि सड़कों पर उतरा गुस्सा इससे कुछ ज्यादा चाहता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसआर सिंह दिल्ली गैंग रेप में सजा के मुददे पर अदालत के हांथ कानून से बंधे पाते हैं। वे कहते हैं कि अदालत वह सजा नहीं दे सकती जिसका कानून में प्रावधान नहीं है। गैंग रेप के लिए कानून में दस साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान है। हालांकि वे मानते हैं कि जिन मामलों में पीड़ित का जीवन मौत से बदतर बन गया हो, जैसा कि इस मामले में है, दोषियों को मौत की सजा मिलनी चाहिए। इसके लिए कानून में जरूरी संशोधन होने चाहिए। 1994 में दुष्कर्म व हत्या में धनंजय चटर्जी की फांसी पर मुहर लगाते समय कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के प्रति बढ़ते हिंसक अपराध पर सजा के बारे में बड़ी विषमता है। ज्यादातर को तो सजा ही नहीं होती। यह ठीक है कि सजा का कोई एक सा फार्मूला नहीं हो सकता। लेकिन सजा का उददेश्य पूरा होना चाहिए। महाराष्ट्र के एक टीचर शिवाजी को दुष्कर्म और हत्या के जुर्म में मौत की सजा सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि दंड देते समय समाज पर उसके प्रभाव को ध्यान में न रखना कई बार बेकार की कवायद साबित होती है। बलात्कार और हत्या के एक और मामले में अभियुक्त बंटू की फांसी पर मुहर लगाते हुए कोर्ट कह चुका है कि अपराधी को उचित दंड देकर समाज की न्याय के लिए पुकार का जवाब दिया जाना चाहिए। कानून का उद्देश्य समाज की रक्षा और अपराधी को भयभीत कर अपराध करने से रोकना है।