21 February 2019



मनोरंजन
क्या मुन्नी और शीला हैं रेप की जिम्मेदार?
12-01-2013
पहले महिलाओं को फिल्मों में मां, बहन और बेटी कहकर बुलाया जाता था, उन्हें सम्मान दिया जाता था, लेकिन आज फिल्मों में महिलाओं को मुन्नी, शीला और चमेली कह कर बुलाया जाता है। फिल्म आलोचकों का कहना है कि फिल्मों में बढ़ते आइटम नंबर ही महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के लिए जिम्मेदार हैं। आइटम नंबर में जिस तरह से अश्लील शब्दों का प्रयोग होता है, जिस तरह से महिलाओं के रूप को दर्शाया जाता है ऐसे में पुरुषों की नीयत पर सवाल खड़े होते हैं। बॉलीवुड में इस पर जमकर विवाद छिड़ गया है। हालांकि फिल्मी दुनिया से जुड़ी कई बड़ी हस्तियों ने इस आरोप को पूरी तरह से खारिज किया है। पहले भी फिल्म जॉनी मेरा नाम में पद्मा खन्ना ने हुस्न के लाखों रंग कौन सा रंग देखोगे.. ऐसे आइटम नंबर किए हैं लेकिन बड़ी ही शालीनता से इस तरह के आइटम नंबर किए गए थे। हालांकि सेंसर बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन ने आजकल की फिल्मों में चलने वाले आइटम नंबर में कुछ बदलाव करने की योजना बनाई थी। सामाजिक कार्यकर्ता और अभिनेत्री शबाना आजमी ने इस बारे में कहा कि महिलाओं की सादगी और खूबसूरती तो दिखाने के लिए ही होती है, उनके कंपकंपाते होठ, उनकी सुराही दार गर्दन। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी नुमाइश की जाए। महिलाओं की कामुकता को गलत ढंग से नहीं दिखाना चाहिए। लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा। उन्हें गाने और आइटम नंबर में फर्क तलाशना सीखना होगा। फिल्म निर्माता सोनी राजदान ने कहा कि फिल्में समाज का आइना होती हैं। महिलाएं, सेक्स और पुरुष समाज का वह हिस्सा हैं जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। बस इन्हें पेश करने के नजरिए में फर्क होता हैं। वहीं तनिस्था चटर्जी ने कहा कि निर्माताओं को फिल्मों में महिलाओं को उतारने से पहले सोचना चाहिए। निर्माता और निर्देशकों को और सेंसेटिव होना होगा। लेकिन यह बात पूरी तरह से गलत है कि फिल्मों में महिलाओं की स्थिति की वजह से ही रेप की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस बीच, प्रसून जोशी, नसीरुद्दीन शाह और महेश भंट्ट ने भी इस बात पर आपत्ति जताई है और कहा है कि फिल्में कभी भी समाज के किसी भी पक्ष को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं बनती हैं। बल्कि पुरुषों को अपने नजरिए में बदलाव लाना चाहिए।