16 February 2019



राष्ट्रीय
जब सेना ने महज 26 घंटे में करा दिया आजाद
15-01-2013
आज सेना दिवस देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने की प्रेरणा का पवित्र अवसर है। यह देश के जांबाज रणबांकुरों की शहादत पर गर्व करने का एक विशेष मौका भी है। आज दिल्ली कैंट के गैरीसन ग्राउंड में आर्मी डे परेड में सेना अपना दम खम देश और पूरी दुनिया को दिखाया। भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह ने कहा है कि सेना भारतीय सीमा की सुरक्षा के लिए सदैव तैयार है। अलग-अलग तरह की चुनौतियों के मद्देनजर हमारी उच्च स्तर की तैयारियां हैं। मैं पूरे देश को भरोसा देना चाहता हूं कि हर मुश्किल से लड़ने में भारतीय सेना सक्षम है। मानवीय अधिकारों के नजरिए से भारतीय सेना का स्थान दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। यह देश का 64 वां सेना दिवस है। सेना दिवस दरअसल सेना की आजादी का जश्न है। 15 जनवरी 1948 को पहली बार के एम करियप्पा को देश का पहला लेफ्टीनेंट जनरल घोषित किया गया। इसके पहले ब्रिटिश मूल के फ्रांसिस बूचर इस पद पर थे। इस समय 11 लाख 30 हजार भारतीय सैनिक थल सेना में अलग-अलग पदों पर कार्यरत हैं, जबकि 1948 में सेना में तकरीबन दो लाख सैनिक थे। पहले की बात कौन करे आज भी हम बाहरी दुश्मनों के साथ ही आंतरिक समस्याओं में भी सेना के ही सहारे हैं। बाढ़ आ जाए तो सेना, आतंकियों से लड़ना हो तो सेना, सरकारी कर्मचारी हड़ताल कर दें तो सेना, पुल टूट जाए तो सेना, चुनाव कराने हों तो सेना, तीर्थ यात्राओं की सुरक्षा भी सेना के हवाले है। हमारे जवान जागते हैं तो हम चैन से सोते हैं। चलिए हम भारतीय थल सेना की पांच शौर्य गाथाएं आपको याद दिलाते हैं। हैदराबाद का विलय भारत के बंटवारे के बाद हैदराबाद के निजाम ने स्वतंत्र रहने की जिद ठान रखी थी। इसके बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल ने 12 सितंबर 1948 को हैदराबाद की सुरक्षा के लिए भेजा। महज पांच दिन में ही निजाम परास्त और सेना के अगुवा मेजर जनरल जयन्तो नाथ चौधरी को सैन्य शासक घोषित कर दिया गया। प्रथम कश्मीर युद्ध एक तरफ आजादी का जश्न तो दूसरे ही पल कश्मीर में भारत-पाक के बीच युद्ध शुरू। हरि सिंह की सहायता की मांग पर सरकार ने सेना को भेजा और भारतीय थल सेना अपने देश के लिए उन लोगों से ही लोहा लिया जो चंद रोज पहले अपने साथी हुआ करते थे।