15 February 2019



राष्ट्रीय
पुलिस सुरक्षा की खैरात पर सुप्रीम कोर्ट नाराज
18-01-2013
सांसदों और विधायकों सहित हर किसी को पुलिस सुरक्षा खैरात की तरह बांटने पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों से ऐसे लोगों की सूची मांगी है, जिन्हें सुरक्षा दी गई है और जिसका खर्च राज्य उठा रहे हैं। वहीं दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि वीवीआइपी को उनके पद या खतरे के आधार पर नहीं बल्कि सुरक्षा इसलिए मुहैया कराई जाती है ताकि वे पक्षपात रहित और सही फैसले ले सकें। इस हलफनामे पर क्षुब्ध कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की खिंचाई भी की। जस्टिस जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि पुलिस सुरक्षा सिर्फ ऐसे लोगों को मुहैया कराई जानी चाहिए जो कि महत्वपूर्ण संवैधानिक पद संभाल रहे हों या फिर उनकी जान को कोई खतरा हो। राज्यों के प्रमुख, प्रधानमंत्री, उप राष्ट्रपति, सभापति, मुख्य न्यायाधीश और संवैधानिक प्राधिकरण के प्रमुखों को सुरक्षा दी जा सकती है। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सरकारी सुरक्षा प्राप्त लोगों का पूरा विवरण तीन हफ्ते में तलब किया है। इसमें नाम और पद सहित कितने सुरक्षाकर्मी दिए गए हैं, इसका पूरा ब्योरा देना होगा। यह भी बताना होगा कि सुरक्षा मुहैया कराने पर सरकारों को कितना खर्च उठाना पड़ रहा है। खंडपीठ ने पूछा कि लालबत्ती के लिए सरकार कोई नीति क्यों नहीं बनाती। कुछ लोगों के गांवों में रहने वाले परिजनों को भी दर्जनों सुरक्षाकर्मी मुहैया कराए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट लालबत्ती के दुरुपयोग पर यूपी के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहा है। हालांकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि सिर्फ उच्च पदों पर बैठे लोगों को ही सुरक्षा नहीं दी जा सकती। बल्कि यह किसी को भी खतरे के आधार पर दी जा सकती है। वहीं, दिल्ली पुलिस की तरफ से दाखिल हलफनामे पर गहरी नाराजगी जताते हुए खंडपीठ ने डिप्टी कमिश्नर [मुख्यालय] को लताड़ लगाई। आठ पेज के हलफनामे को नजरअंदाज करते हुए कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा मिल जाने से हमारे फैसलों पर कैसे प्रभाव पड़ेगा? क्या उक्त अधिकारी की समझ का यही स्तर है। ऐसे अधिकारी के लिए सीआरपीसी और आइपीसी का अध्ययन जरूरी है।