24 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
सुरक्षा परिषद में भिड़े भारत-पाक
23-01-2013
जम्मू कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह [यूएनएमओजीआइपी] की प्रासंगिकता को लेकर भारत और पाकिस्तान सुरक्षा परिषद में भिड़ गए। नई दिल्ली ने कहा कि समूह की जगह 1971 के शिमला समझौते ने ले ली है। जबकि इस्लामाबाद ने जोर दिया बल की अभी भी भूमिका है। यह तीखी नोकझोंक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बहस के दौरान हुई, जिसका आयोजन पाकिस्तान ने किया था। 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद का पाकिस्तान फिलहाल अध्यक्ष है। भारत और पाकिस्तान में यूएनएमओजीआइपी का गठन 1949 में किया गया था। इसका काम नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम की निगरानी करना था। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरदीप पुरी ने सुझाव दिया कि मुश्किल आर्थिक हालातों में पर्यवेक्षक समूह के लिए आवंटित संसाधनों का उपयोग कहीं और करना बेहतर होगा। उन्होंने कहा, यूएनएमओजीआइपी की भूमिका की जगह 1972 के शिमला समझौते ने ले ली है। इस समझौते पर भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों ने हस्ताक्षर किए थे और दोनों देशों की संसदों ने इसकी पुष्टि की थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिमला समझौते के तहत दोनों देशों ने मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीके से द्विपक्षीय वार्ता के जरिए सुलझाने की बात कही थी। पुरी ने कहा कि कठिन आर्थिक हालातों में हमें इस सवाल का जवाब देने की जरूरत है कि यूएनएमओजीआइपी पर व्यय हो रहे धन का कहीं और बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। चर्चा के आखिर में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि मसूद खान ने पुरी की टिप्पणियों का जवाब देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच किसी भी द्विपक्षीय समझौते ने पर्यवेक्षक समूह की भूमिका या वैद्यता की जगह नहीं ली। चर्चा की अध्यक्षता करते हुए पाकिस्तान के विदेश सचिव अब्बास जिलानी ने कहा कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के सबसे पुराने शांति अभियानों में से एक यूएनएमओजीआइपी का भी मेजबान है। जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर शांति की निगरानी में इस अभियान ने अहम भूमिका अदा की है।