19 February 2019



राष्ट्रीय
कहां हैं भविष्यदृष्टा अखिलेश ?
19-02-2013

लखनऊ [दिलीप अवस्थी]। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जब भी अकेले में बात कीजिए तो उनके मन में प्रदेश की औद्योगिक संभावनाओं की हिलोर उठती साफ दिखाई देती है, लेकिन जब भी वक्त आता है उन्हें अमलीजामा पहनाने का तो प्राथमिकताएं प्रदेश के विकास और लोक-लुभावन योजनाओं के बीच झूलती नजर आती हैं। उद्योग-कारखानों के प्रदेश में आने के लिए जैसे ही जमीन तैयार करने की जरूरत महसूस होती है, 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव का मंजर आंखों के सामने नाच जाता है। बजट भाषण प्रदेश के विकास दर की बात करते-करते अचानक \'किसान-मुसलमान और छात्र-नौजवान\' के चुनावी नारे में सिमट कर रह जाता है। अखिलेश यादव के दूसरे बजट में भी उनके अंदर छटपटाता भविष्यदर्शी अंडा तोड़कर बाहर नहीं निकल पा रहा है। अगर प्रदेश सरकार का पिछला बजट कुछ हड़बड़ी में जुलाई में पेश हो पाया था तो इस बार 10.5 प्रतिशत की बढ़त कर दो लाख 21 हजार करोड़ रुपये का बजट साफतौर पर चुनावी माहौल के मद्देनजर तैयार हुआ। प्रदेश बसपा का कहना है कि पिछला बजट कुल 46 प्रतिशत ही खर्च हो पाया है तो अखिलेश कहते हैं कि सिर्फ सात माह में काफी हद तक काम पूरे हुए हैं। रुकावट केवल केंद्र सरकार द्वारा योजनाओं के लिए 40 हजार करोड़ में से सिर्फ 19 हजार करोड़ रुपये की राशि भुगतान किए जाने के कारण उत्पन्न हुई है। पीडब्लूडी जैसे विभाग में पिछले बजट का 27 प्रतिशत बकाया होना या फिर सिंचाई विभाग में 25 फीसद की बकाएदारी नि:संदेह सरकार की कार्यकुशलता पर सवालिया निशान लगाती है। ऐसे में लगभग 240 करोड़ रुपये का घाटा प्रदेश की आर्थिक स्थिति को और विषम ही बनाएगा। इसी के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर 1200 करोड़ रुपये का बेरोजगारी भत्ता या फिर लखनऊ को मेट्रो की सौगात या कर्जमाफी के लिए बड़े प्रावधान कुछ बेतुके से नजर आते हैं। इन योजनाओं को अगर पूर्वाचल और बुंदेलखंड जैसे विशाल क्षेत्रों के विकास के लिए सिर्फ 291 करोड़ रुपये का प्रस्तावित बजट कुछ हास्यप्रद सा लगता है। उद्योगों को आकर्षित करने के लिए आधारभूत प्रणालियों और सेवाओं के नाम पर आगरा-लखनऊ के बीच आठ लेन का एक्सप्रेस वे या फिर कुछ ओवरब्रिजों, पुलों की बात कही गई है। बिजली क्षेत्र में सिर्फ 27 फीसद की बजट वृद्धि दूसरे राज्यों से महंगी बिजली खरीदने के लिए भी कम पड़ेगी। उत्पादन क्षमता की बढ़ोतरी पर सरकार का बजट कुछ स्थितिप्रज्ञ भाव में है। बिजली संकट से उबरने के लिए कोई भी ठोस दीर्घकालीन योजना का स्पष्ट अभाव नजर आ रहा है। सड़कों की स्थिति प्रदेश की अन्य शहरों की तो छोड़िए, लखनऊ में ही अत्यंत दयनीय है। सरकार के समयबद्ध आश्वासनों के बाद भी शहर की कुछ प्रमुख सड़कों पर महज पैबंद लगाने का कार्य ही हो पाया है। उद्योगपति इन्हीं टूटी सड़कों से होकर प्रदेश की लालफीताशाही से कैसे निपट पाएगा, इसका कोई समुचित उपाय उत्तर प्रदेश के 2013-14 के बजट में नजर नहीं आता। पिता और सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने अपने पुत्र की ताजपोशी के बाद दो वर्ष का समय मांगा था। पुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश ने पहला वर्ष तो शायद प्रदेश और यहां के हरफनमौला अधिकारियों को समझने-बूझने में लगा दिया। इस बजट के उत्तरा‌र्द्ध में या उसके कुछ समय उपरांत प्रदेश की जनता अखिलेश के कार्यकाल का एक बार फिर आकलन करेगी। संभवत: इसीलिए भविष्यदृष्टा अखिलेश को अभी अगले बजट का इंतजार करना होगा।