18 February 2019



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विक्रम वर्मा की उपेक्षा या बड़ी जिम्मेदारी की कोशिश
17-03-2012

बीजेपी संगठन में पिछले कुछ सालों से कांग्रेसी मानसिकता या उसी की परिपाटी पर चलने की होड़ से मची हुई है। संगठन में वरिष्ठ और बीजेपी की नींव रखने वाली नेताओं की जिस तरह से उपेक्षा हो रही है उससे एक संदेश तो जा रहा है कि बीजेपी पहले जैसी नहीं रही। बीजेपी में मालवा निमाड़ क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले और जमीन की लड़ाई लड़ने वाले विक्रम वर्मा को राज्य सभा से दोबारा न भेजे जाने से यह सवाल उठा है कि आखिर बीजेपी कद्दावर किस्म के नेताओं की उपेक्षा क्यों कर रही है चाहे बात रघुनंदन शर्मा की हो, सत्यनारायण जटिया की हो या फिर विक्रम वर्मा और नंदकुमार चौहान जैसे नेताओं की। सभी कमोवेश बैकफुट पर धकेले जा रहे हैं। इसका अर्थ यह भी माना चाहिए कि आने वाले समय में बीजेपी का कार्यकर्ताओं में इससे अच्छा संदेश नहीं जाएगा। वजह यह भी है जिस तरह से बाहरी या दूसरी पार्टियों से आए लोगों को महत्वपूर्ण पद पकड़ाए जा रहे हैं उससे पार्टी का मूल कार्यकर्ता हैरान है वह सोचता है कि जब सब कुछ धनबल ,बाहुबल से होना है तो वह पार्टी के लिए काम क्यों करे। इस बात को पार्टी के नेता समझा नहीं पा रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि वह अल्पसंख्यकों या वोटबैंक के नाम पर दमदार नेताओं को किनारे कर बाहरी लोगों को महत्व दे रही है। बीजेपी को यहां यह भी सोचना होगा कि जिन अल्पसंख्यकों को वह गले लगा रही है वह पार्टी के जनाधार को बढ़ाने का काम भी कर रहे हैं या सिर्फ सत्ता की मलाई खाने के लिए आगे आए हैं। राज्यसभा चुनावों में नजमा हेपतुल्ला को मध्यप्रदेश कोटे से भेजा जाना न केवल मध्यप्रदेश के बीजेपी नेताओं का अपमान है बल्कि पार्टी के मानसिक दिवालिएपन का भी परिचायक है यह ठीक वैसे ही प्रयोग हो रहे हैं जैसे कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने यूपी में किए और उन्हें हालिया विधानसभा चुनावों में मुंह की खानी पड़ी। बात अल्पसंख्यकों को गले लगाने की भी हो रही है पिछले चुनाव से बीजेपी के कुछ नेताओं ने अलग किस्म का राग अलापना शुरू कर दिया है, सबको लेके चलो । हालत आगे ये होगी कि जो जनाधार है वो भी हाथ से जाएगा और नया तो आने से रहा। ज्यादा दूर क्यों जाते हैं पिछले विधानसभा चुनाव में ही बीजेपी का वोट बैंक दस फीसदी घटा है वह तो कांग्रेस की फूट थी जिसने दोबारा बीजेपी की सरकार बनवा दी लेकिन इस पर यदि बीजेपी नेता गरज रहे हैं तो उन्हें होशियार हो जाना चाहिए क्योंकि एक बार सत्ता जाने के बाद कोई हाथ नहीं लगाएगा जैसी हालत यूपी में बीजेपी की हुई है कमोवेश वहीं हाल मध्यप्रदेश में भी होना तय है।  बात सिर्फ राज्यसभा सीट की नहीं है बात यह भी है कि यदि पार्टी में ऐसे ही स्काईलैब की तरह ऊपर से आधारहीन नेता पदों पर गिरते रहे तो बेचारे आम कार्य़कर्ता को बीजेपी से छिटक ही जाएंगे साथ ही वह मतदाता भी पार्टी से किनारा कर लेगा जो बीजेपी के जनाधार वाले जमीनी नेताओं के साथ रहना चाहता  है। पार्टी में कांग्रेस से आए नेताओं को जिस तरह से महत्व मिलता है वह चौंकाने वाला है। बालेन्दु शुक्ल, प्रेमनारायण ठाकुर इसका उदाहरण है वहीं बीजेपी की मूल विचारधारा वाले नेताओं की बात करे तो प्रहलाद पटेल जैसे नेता को भी तो राज्यसभा से भेजा जा सकता था लेकिन इस बात पर किसी ने विचार ही नहीं किया। नजमा को आगे किया गया क्योंकि दिल्ली में बैठे कुछ जनाधार विहीन नेता ऐसा चाहते थे। आखिर मध्यप्रदेश की जनता क्यों बीजेपी को कांग्रेस से अलग समझे वहां हाईकमान की चलती है तो यहां भी तो कमोवेश वही हो रहा है ।