18 February 2019



प्रादेशिक
दुष्कृत्य व हत्या के दोषी को मौत की सजा
15-03-2013
गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता के बंगले के पास 8 साल की बच्ची से दुष्कृत्य के बाद नृशंस हत्या के मामले में भोपाल जिला एवं सत्र न्यायालय ने 50 वर्षीय व्यक्ति को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई है। महज नौ दिन सुनवाई करने के बाद गुरुवार को अपने फैसले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुषषमा खोसला ने कहा कि आरोपी नंदकिशोर का अपराध \'दुर्लभों में भी दुर्लभ\' की श्रेणी में आता है, लिहाजा यदि मृत्युदंड से भी कठोर कोई दंड हो तो वो भी कम है।

अदालत ने आरोपी को मृत्युदंड की सजा अबोध बालिका की हत्या करने के आरोप में सुनाई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, आरोपी को तब तक रस्सी के फंदे पर लटकाया जाए, जब तक उसके प्राण न निकल जाएं।\' अदालत ने कहा कि आरोपी ने क्रूरतापूर्वक अबोध बच्ची का पहले बहला फुसलाकर अपहरण किया और फिर उसके साथ बलात्कार कर निर्मम हत्या कर दी। पहचान छिपाने की दृष्टि से बच्ची के चेहरे को पत्थर से कुचलकर हत्या की। यह जघन्य अपराध है।

अन्य धाराओं में भी सजा

आरोपी नंदकिशोर तमोली को भादिवि की धारा 363 में 7 साल कैद व 500 रुपए जुर्माना, धारा 366 में 10 साल कैद व 500 रुपए जुर्माना, धारा 376 [2][एफ] में उम्र कैद व एक हजार रुपए जुर्माना और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 5 व 6 के अपराध में उम्र कैद तथा एक हजार रुपए जुर्माना किया गया।

सिर-पैर गायब थे

अभियोजन अनुसार घटना 3 फरवरी 2013 की दरम्यानी रात को गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता के बंगले के पास, टीटी नगर थाना क्षेत्र में हुई थी।

पुलिस को नरेन्द्र धूरिया ने सूचना दी थी कि उसकी बच्ची रात को करीब 8 बजे भोपाल उत्सव मेले से गुम हो गई है। पुलिस ने गुमशुदगी कायम कर मामले की जांच शुरू कर दी। दूसरे दिन मेले में किताबों की दुकान लगाने वाले अनूप मौर्य ने एक कुत्ते को मुंह में बच्ची का पैर दबाकर ले जाते हुए देखा। उसने जब झाड़ियों के पास जाकर देखा तो वहां एक बच्ची का क्षतविक्षत शव पड़ा था। सिर और पैर नहीं थे। अनूप ने इस बात की सूचना पुलिस को की। तीन दिन बाद पुलिस ने नंदकिशोर को गिरफ्तार किया। आरोपी ने पूछताछ में बताया कि पहले उसने बच्ची से बलात्कार किया और बाद में उसका सिर काटकर हत्या कर दी।

बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में अदालत ने मात्र 9 दिन की सुनवाई में ही फैसला सुना दिया। देश में यह पहला मामला है संभवत: जिसका फैसला इतनी कम अवधि के अंदर सुना दिया गया। 7 मार्च को मुल्जिम बयान, 12 मार्च को अंतिम बहस और 14 मार्च की दोपहर डेढ़ बजे फांसी की सजा का फैसला सुना दिया गया।

24 दिन बाद चालान

टीटी नगर पुलिस ने 27 मार्च को आरोपी के खिलाफ भादवि की धारा 363, 366, 376[2][एफ], 302 के आरोप में चालान पेश किया था। मामले में हाल ही में लागू लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 5[2][ड] भी आरोपी के खिलाफ पंजीबद्ध किया गया था। 200 पेज के चालान में कुल 55 गवाहों की सूची पेश की गई। सरकारी वकील राजेन्द्र गिरी ने 30 गवाहों की सूची तैयार की। 27 फरवरी को आरोप तय कर दिए गए।

पांच दिन में गवाही पूरी

गवाही का दौर 1 मार्च से शुरू होकर 6 मार्च को समाप्त हो गया। कुल 33 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। पहले दिन घटना के मुख्य गवाह मृतका के 6 वर्षीय भाई चुन्नु, मां सपना और पिता नरेन्द्र सहित अन्य दो गवाहों के बयान दर्ज हुए। सुनवाई के दूसरे दिन 13, तीसरे दिन 9, चौथे दिन 5 और पांचवे दिन जांच अधिकारी एसकेएस तोमर के बयान दर्ज होते ही गवाही का दौर समाप्त हो गया।

मुल्जिम से पूछे 456 प्रश्न

अदालत ने 7 मार्च को आरोपी से अपराध के संबंध में कुल 456 प्रश्न किए। आरोपी ने एक-एक कर प्रश्नों के जवाब दिए।

चेहरे पर नहीं थी कोई शिकन

अदालत ने दोपहर जब फैसला सुनाने के लिए आरोपी को बुलाया तो उसके चेहरे पर न तो किसी तरह का पछतावा था, न ही किसी प्रकार की शिकन दिखाई दे रही थी। वह फैसले के पहले करीब 15 मिनट तक कटघरे में खडे़ रहकर अदालत में उपस्थित वकीलों को देखता रहा। अदालत ने जब उससे अपराध के बारे में पूछा तो उसने कहा कि उसने तो नहीं किया करने वाला कोई और ही है। अदालत ने पूछा कि तुमने यह बात अपने वकील को क्यों नहीं बताई तो वह इसका उत्तर नहीं दे सका।

पत्नी ने भी नहीं दिया साथ

आरोपी ने बचाव साक्ष्य के लिए अपनी पत्नी सुशीला को बुलाया था। सुशीला को 12 मार्च को अदालत में हाजिर होना था लेकिन वह अदालत में आई ही नहीं। सुनवाई के दौरान आरोपी से उसकी पत्नी व अन्य परिजन मिलने नहीं आए।

एक माह में दूसरी फांसी की सजा

जिला न्यायाधीश सुषमा खोसला ने एक माह में यह दूसरा फांसी की सजा का फैसला सुनाया है। यह पहला मौका है जब एक न्यायाधीश ने अपने कार्यकाल में दो फांसी की सजा के फैसले इतने कम अंतराल में सुनाए हों। न्यायाधीश खोसला ने इससे पूर्व 21 फरवरी को आरोपी दिलीप बनकर को फांसी की सजा का फैसला सुनाया था।