24 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
ईरान, उ. कोरिया व सीरिया ने रोका शस्त्र संधि का रास्ता
29-03-2013
ईरान, उत्तर कोरिया और सीरिया ने संयुक्त राष्ट्र शस्त्र व्यापार संधि [एटीटी] का रास्ता रोक दिया है। एटीटी के तहत विश्व में प्रति वर्ष 70 अरब डॉलर [करीब 3000 अरब रुपये] के परंपरागत हथियारों के व्यापार के लिए नियम बनाए जाने हैं। तीनों देशों का कहना है कि यह संधि दोषपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से विद्रोहियों को हथियारों की बिक्री पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। इस अवरोध को दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन के राजदूत मार्क लयाल ग्रांट ने संधि के मसौदे को संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून के पास भेज दिया है। उन्होंने मेक्सिको, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देशों की ओर से महासचिव से कहा कि इस पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में शीघ्र मतदान कराया जाए। संयुक्त राष्ट्र राजनयिकों ने कहा कि महासभा संधि के मसौदे पर मंगलवार को मतदान करा सकती है। ब्रिटेन की मुख्य प्रतिनिधि जोआने एडमसन ने कहा, \'एक अच्छी और मजबूत संधि को रोक दिया गया है। विश्व में अधिकांश लोग हथियार के व्यापार के लिए नियम बनाना चाहते हैं। उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए।\' ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने देश की प्रेस टीवी से कहा था कि तेहरान एटीटी का समर्थन करता है। जबकि संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत मुहम्मद खाजी ने संधि का मसौदा तैयार करने वाली कांफ्रेंस में कहा कि वह वर्तमान स्वरूप में संधि को नहीं स्वीकार कर सकते हैं। ईरान के सुर में सुर मिलाते हुए सीरियाई राजदूत बशर जाफरी ने कहा कि उन्हें भी इस बात को लेकर आपत्ति है कि संधि में विद्रोहियों तक हथियार पहुंचने से रोकने का प्रावधान नहीं है। उत्तर कोरिया के प्रतिनिधि ने कहा कि यह संधि भेदभाव वाली है और इसमें संतुलन नहीं है। उधर अमेरिका ने कहा है कि एटीटी भारत के सुरक्षा हितों के लिए नुकसानदेह नहीं है। यह बात अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे टॉम कंट्रीमैन ने कही। बान की मून ने जताई निराशा संयुक्त राष्ट्र। संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है कि शस्त्र व्यापार संधि को सर्वसम्मति से स्वीकार नहीं किए जाने से उन्हें निराशा हुई है। इससे विश्व में अरबों डॉलर के शस्त्र कारोबार के लिए नियम बनाने में मदद मिल सकती थी। ईरान, उत्तर कोरिया और सीरिया द्वारा संधि को स्वीकार करने में बाधा डालने के बाद मून ने अपनी गहरी निराशा व्यक्त की। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों की सहमति जरूरी है।