17 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
नहीं रहे सरबजीत, सदमें में परिवार
02-05-2013
जिंदगी और मौत से जूझ रहे भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह अंतत: मौत से हार गए, यह जानकारी मेडीकल बोर्ड के प्रमुख ने दी। अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार उनकी मौत बुधवार देर रात एक बजे [पाकिस्तान के समयानुसार] जिन्ना अस्पताल में हुई। विगत छह दिनों से लाहौर के कोट लखपत जेल में छह कैदियों के जानलेवा हमले में बेहद गंभीर रूप से घायल हुए भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह जिन्ना अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। इसके पूर्व, लाहौर के जिन्ना अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे भारतीय कैदी सरबजीत से मिलने गया उनका परिवार हालत में सुधार न होते देख बुधवार को निराश होकर वतन लौट आया। पाकिस्तान से लौटने के बाद अटारी सड़क सीमा पर उनकी बहन दलबीर कौर के सब्र का बांध टूट गया।

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उन्होंने भाई के इलाज में लापरवाही पर पाकिस्तान को तो कोसा ही, ढुलमुल नीति के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत केंद्र सरकार को भी जमकर खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरबजीत पर दोनों देशों ने मिलकर हमला करवाया है। हालात की मारी दलबीर ने कहा, \'सरकार ने सरबजीत को भारत लाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। मनमोहन सिंह अपने ही नागरिक की सुरक्षा करने में नाकाम रहे हैं। उन्हें अपनी कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। सरकार ने सरबजीत के मुद्दे पर परिवार से नहीं, पूरे देश के साथ धोखा किया है। हमसे कहा गया था कि मीडिया के पास न जाएं। जरदारी आए तो चिश्ती को लेकर चले गए, लेकिन मनमोहन सरबजीत को नहीं ला पाए। जब मलाला इलाज के लिए विदेश जा सकती है तो मेरा भाई क्यों नहीं?\' दुखी और क्रोधित दलबीर ने यहां तक कह दिया कि आखिर वह किसके सामने रोएं, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर भी तो मिट्टी का खिलौना बैठा हुआ है। वह उसके आगे प्रार्थना ही कर सकती हैं। सरबजीत की पत्‍‌नी सुखप्रीत कौर ने कहा, \'मैं कितनी बदनसीब हूं कि पति से मिली भी तो वह जिंदगी व मौत के बीच जूझ रहे थे। उनके साथ कोई बात नहीं कर पाई। बेटियां स्वप्नदीप व पूनम उन्हें देख कर फफक कर रोने लगी थीं।\' दूसरी तरफ, दलबीर कौर पूरे परिवार के साथ देर रात नई दिल्ली पहुंच गई। वह यहां अंतिम बार मनमोहन, सोनिया, सलमान खुर्शीद व सुशील कुमार शिंदे से मुलाकात कर सरबजीत को वापस लाने की मांग करेंगी।

दुखियारी बहन का दर्द : यदि केंद्र सरकार ने सरबजीत को बचाने के लिए कोई प्रयास न किए तो वह अटारी सड़क सीमा पर ट्रकों के आगे लेट जाएंगी। समझौता एक्सप्रेस की पटरियों पर बैठ जाएंगी। उनके वतन लौट आने के बाद पाकिस्तान की सरकार सरबजीत को मारने की साजिश रच सकता है। वह तीन दिन तक लाहौर रहीं। इस दौरान वह केवल पांच बार ही अपने भाई से मिल पाई।