19 February 2019



राष्ट्रीय
लालू के बाद रेलवे से स्थिरता गायब
11-05-2013
लालू प्रसाद यादव आखिर ऐसा कौन सा जादू करके गए हैं कि उनके बाद कोई भी मंत्री रेल भवन में टिक नहीं पा रहा है। लालू के बाद चार सालों में छह रेलमंत्री रेल भवन में आए। ममता को छोड़ किसी की कुर्सी एक साल भी नहीं टिकी। वर्ष 2009 के आम चुनावों के साथ ही रेलमंत्री के रूप में लालू प्रसाद के पांच साल के चर्चित कार्यकाल का अंत हो गया था। रेलवे में लालू के कार्यो को लेकर विवाद भले हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि उनका कार्यकाल सफल था और इससे रेलवे की कार्यप्रणाली में स्थायित्व आया था। परंतु लालू के बाद स्थिति आयाराम-गयाराम वाली हो गई है। संप्रग-2 में रेल मंत्रालय तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को मिला। उनके आते ही विवाद शुरू हो गए थे। उन्होंने श्वेतपत्र लाकर यह साबित करने की कोशिश की कि लालू के मुनाफे के दावे खोखले हैं और वास्तव में वह रेलवे को खराब हालत में छोड़कर गए हैं। अब सभी को मालूम है कि ममता ने ऐसा क्यों किया था। दरअसल छठा वेतन आयोग लागू होने से रेलवे पर 14 हजार करोड़ का वित्तीय बोझ बढ़ा था और इसकी भरपाई के लिए ममता किराया बढ़ाने को तैयार नहीं थीं। बाद में पश्चिम बंगाल के चुनाव होते ही ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री बन गई और उन्हें रेल भवन छोड़ना पड़ा। उन्होंने अपनी जगह दिनेश त्रिवेदी को सौंपी। लेकिन रेल बजट में किराये बढ़ाने के कारण त्रिवेदी को ममता का कोपभाजन बनना पड़ा। तब ममता ने मुकुल राय को भेजा, जिन्होंने त्रिवेदी के किराया वृद्धि के ज्यादातर प्रस्ताव वापस ले लिए। लेकिन उन्हें भी रेल भवन का ज्यादा सुख नहीं मिला। जल्द ही पश्चिम बंगाल को पैकेज के सवाल और एफडीआइ पर ममता से संप्रग सरकार के संबंध बिगड़ गए और तृणमूल सरकार से अलग हो गई। इसके बाद प्रधानमंत्री ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री डॉ. सीपी जोशी को रेलवे का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा। वह अभी अपने पक्के होने का ख्वाब देख ही रहे थे कि अचानक पवन बंसल को रेल मंत्रालय की कमान सौंप दी गई। बंसल ने भरोसा जगाया कि रेलवे की हालत सुधारने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। लेकिन रेल बजट से पहले और बाद किराया बढ़ाने के साथ ही मानो बंसल की उलटी गिनती शुरू हो गई थी। साल पूरा होने से पहले वह भी घूसकांड की बलि चढ़ गए। एक बार फिर डॉ. सीपी जोशी को रेलवे का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है। कुछ लोगों का मानना है कि रेल भवन में यह अस्थिरता रेलमंत्री के कक्ष से भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर हटाने से पैदा हुई है। इसे लालू ने लगवाया था और इसकी रोज पूजा होती थी। मगर ममता के आते ही इसे हटवा दिया गया था। बाद में किसी भी रेलमंत्री ने इसे बहाल नहीं किया। इसी तरह जिसने भी किरायों को छेड़ा उसे जाना पड़ा है।