18 February 2019



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सरकार की लापरवाही से लोकायुक्त खफा
20-05-2013
लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर सरकार की लापरवाही से इन दिनों खासे खफा हैं। लोकायुक्त के बार--बार कहे जाने के बावजूद डे़़ढ दर्जन से ज्यादा विभागों ने अभी तक भ्रष्टाचार की शिकायतों के निराकरण के लिए नोड्ल ऑफीसर तैनात नहीं किए हैं। इसकी वजह से भ्रष्टों के खिलाफ जांच के लिए जरूरी दस्तावेज मिलने में जांच एजेंसी को परेशानी का सामना करना प़़ड रहा है। लोकायुक्त ने मुख्य सचिव आर परशुराम को पत्र लिखकर विभागों की इस कारस्तानी पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। यह कोई पहला मौका नहीं है, जब लोकायुक्त शासन के समक्ष आपत्ति दर्ज करा रहे हैं। इसके पहले भी अभियोजन स्वीकृति में विलंब को लेकर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को क़़डा पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज करा चुके हैं। इसका असर मात्र इतना हुआ कि मुख्य सचिव ने सभी विभागों को पत्र लिखकर प्रकरणों में तेजी से कार्रवाई करने के निर्देश दिए, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। बताया जा रहा है कि इस बार लोकायुक्त की नाराजगी नोड्ल ऑफीसरों की तैनाती को लेकर है। दरअसल, लोकायुक्त पुलिस जब भी छापा मारती है या किसी अधिकारी को रंगे हाथों रिश्वत लेते दबोचती है तो फिर आगे कार्रवाई करने के लिए कई दस्तावेजों की दरकार होती है। ये दस्तावेज विभागीय अधिकारी देने में आनाकानी करते हैं और जांच अधिकारियों को बारबार चक्कर कटवाते हैं। इसलिए लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू ने सभी विभागों से एक अधिकारी को जांच एजेंसियों से समन्वय बनाने के लिए तैनात करने कहा था। सूत्रों के मुताबिक अभी तक 29 विभागों ने ही निर्देशों पर अमल किया है। अधिकांश विभागों ने काम के बोझ से दबे उप सचिवों को नोड्ल अधिकारी नियुक्त करते हुए इनके टेलीफोन और मोबाइल नंबर जांच एजेंसियों को मुहैया कराए हैं। लेकिन बाकी विभाग इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। जबकि, इनमें कई विभाग ऐसे हैं जिनके मैदानी अफसर रिश्वत लेते रंगे हाथों दबोचे गए हैं। यही वजह है कि लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर ने एक बार फिर शासन को पत्र लिखकर नोड्ल ऑफीसर तैनात करने के लिए विभागों को निर्देश देने का मुद्दा उठाया है। लोकायुक्त पुलिस के सूत्रों का कहना है कि कई शिकायतों की जांच जरूरी दस्तावेज नहीं मिलने की वजह से पूरी नहीं हो पा रही है। बताया जा रहा है कि लोकायुक्त कार्यालय को आए दिन भ्रष्टाचार की नामी-बेनामी शिकायतें मिलतरी रहती हैं। इनकी पड़ताल के लिए जांच अधिकारी को दस्तावेजों की दरकार होती है। विभागीय प्रमुखों से संपर्क करने पर वे नीचे मामला डाल देते हैं और जब नीचे संपर्क किया जाता है तो ऊपर से आदेश दिलाने की बात सामने आती है। इसी कारण लोकायुक्त ने एक बार छापे में पक़़डाए व्यक्तियों को तत्काल मौजूदा पदस्थापना से अलग करने के लिए शासन से कहा था। इसके पीछे लोकायुक्त ने दस्तावेजों से छेड़छाड़ को आधार बनाया था। लेकिन, इस मामले में भी शासन ने लोकायुक्त की पूरी तरह नहीं सुनी। आईएएस रमेश थेटे की पत्नी मंदा थेटे के प्रकरण में सहकारिता विभाग ने एक भी अधिकारी को यहां से वहां नहीं किया। इन्होंने नही बनाए नोड्ल ऑफीसर जैव विविधता एवं जैव प्रौद्योगिकी, वाणिज्यकर, चिकित्सा शिक्षा, खनिज साधन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, योजना आर्थिक एवं सांख्यिकी, जल संसाधन, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व, स्कूल शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सामाजिक न्याय, तकनीकी शिक्षा, सामान्य प्रशासन, वित्त, गृह, वन, आवास पर्यावरण, जन शिकायत, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, राजस्व, नगरीय प्रशासन, लोक सेवा प्रबंधन और विमुक्त घुतक्कड़ एवं अ‌र्द्ध घुमक्कड़ जाति कल्याण। जस्टिस पीपी नावलेकर, लोकायुक्त ने कहा कि भ्रष्टाचार के प्रकरणों में विभागों से जानकारी प्राप्त करने के लिए विभागों को नोड्ल ऑफीसर नियुक्त करने कहा गया है। कई विभागों ने इसका पालन नहीं किया है। इसके संबंध में शासन को पत्र लिखा गया है।