19 February 2019



राष्ट्रीय
सियासी समझदारी के मायने बताएंगे अमित शाह
26-05-2013

मुरादाबाद [ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी]। पछुआ, यानी हवा। तासीर गर्म। गरमी में और भी गर्म। पश्चिम में भाजपा की तेजी ऐसी ही है। वह यहां पर सियासी पछुआ को रणनीति के पम्प से हवा दे रही है। रणक्षेत्र, रणनीति व रणनीतिकार सभी तय हो गए हैं। रह गई है तो मात्र आगाज की भावी तस्वीर, जो 29 मई को अपना रंग दिखाएगी। रंग गाढ़ा हो इसके लिए नकवी भीड़ जुटाएंगे तो अमित शाह सियासी समझदारी के मायने बताएंगे। बाकी कल्याण सिंह और चेतन चौहान देखेंगे। एक लोधों को भाजपा का बोध कराएंगे तो दूसरे राजपूतों में शाट लगाएंगे। बचे जाट, जिसकी काट खोजने में खुद राजनाथ लगे हैं। मैदानों का चयन चौकस है। सर्वाधिक मुस्लिम बहुल क्षेत्र रामपुर, जाटों का जमघट अमरोहा और लोधों के वोट को खुद कल्याण का मैदान अलीगढ़। घोटालों में घिरी कांग्रेस से भाजपा चौदह का लोकसभा चुनाव चैतन्य होकर लडऩा चाहती है। राजनाथ के अध्यक्ष होने से उसे यूपी से खासी उम्मीद है। यूपी में पश्चिमी यूपी की किलेबंदी उसके खास एजेंडे में है। यहां वह विरोधी दलों से निपटेगी तो मुसलमानों को समझा उन्हें जोडऩे के प्रयास करेगी। अंदरखाने की मानें तो इसकी पूरी रणनीति तैयार है, जिसके संकेत अभी से मिल रहे हैं। पश्चिम में जाट और मुसलमान सत्ता की चाबी माने जाते हैं। चुनावों में ये गणित बनाते और बिगाड़ते हैं। भाजपा इस बार इन दोनों चाबियों को अपनी रणनीति का खास हिस्सा बना रही है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ अपनी छवि के अनुसार जाट यानी किसानों के वोट बैंक को खुद संभालेंगे। इसके लिए भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) पर उनकी पैनी नजर है। जाट किसानों का यह संगठन पश्चिमी यूपी की सियासत की दिशा भी तय करता है। परोक्ष रूप से ही सही यह खबर पुख्ता हो चली है कि इन दिनों भाकियू से राजनाथ सिंह की नजदीकी गहरी है। प्रमाण चार जून को अमरोहा के फतेहपुर छितरा में होने वाला कार्यक्रम है। इस खास कार्यक्रम में भाकियू के संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत की प्रतिमा का अनावरण होना है। टिकैत के पुत्र व वर्तमान में भाकियू की कमान संभाल रहे नरेश टिकैत व भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत इस कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता हैं, लेकिन मुख्य अतिथि हैं राजनाथ सिंह। ऐसे में लोकसभा चुनाव तक भाकियू व भाजपा की एकता के स्पष्ट संकेत तो मिल ही रहे हैं। इससे रालोद, सपा और बसपा की पेशानी पर बल भी पड़ गए हैं। क्योंकि दोनों का एका नए समीकरण को जन्म देगा। राजनाथ सिंह ऐसी ही जमीन तैयार करने में लगे हैं। बचे राजपूत तो उसके लिए भाजपा ने चेतन चौहान को सक्त्रिय कर दिया है। वो भी राजनाथ सिंह के आगमन की तैयारी के बहाने अमरोहा को मथ रहे हैं। किसान, जाट व राजपूत को जोडऩे की रणनीति की बागडोर जहां राजनाथ खुद संभाले हुए हैं वहीं भाजपा लोध वोटों के लिए पहले ही कल्याण सिंह को पूरी जिम्मेदारी सौंप चुकी है। उनके निर्देशन में राजवीर सिंह अलीगढ़ बेल्ट में तो विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष डा.नैपाल सिंह रामपुर इलाके में लोध मतदाताओं को भाजपा से उनका पुराना रिश्ता याद दिला रहे हैं। सूत्रों की मानें तो चुनाव आते ही कल्याण खुद लोध फतह अभियान के लिए निकल पड़ेंगे। तीसरा फैक्टर मुस्लिम यूं तो सपा, बसपा व कांग्रेस में बिखरा है, लेकिन इस वोट बैंक में भाजपा भी संभावना देख रही है। मुस्लिम वोट दें या न दें, लेकिन संगठित होकर विरोध न करें, इसके लिए भाजपा रणनीति के तहत काम कर रही है। भाजपा मानती है कि पश्चिमी यूपी के मुस्लिम अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा समझदार हैं। यहीं के मुस्लिमों ने पहली बार मोदी के विकास कायरें की प्रशंसा की, जो भाजपा की नई पूंजी है। इसी पूंजी को अब यूपी में खर्च कर मुसलमानों को जोडऩे की रणनीति पर काम कर रही है भाजपा। रामपुर में पार्टी के यूपी प्रभारी अमित शाह का आना इसी रणनीति का हिस्सा है। कारण साफ है रामपुर में कश्मीर के बाद सर्वाधिक मुस्लिम वोटर हैं। सो, मुसलमानों को समझाने के लिए रामपुर में भाजपा की पहली पाठशाला लग रही है। इसमें भीड़ जुटी तो भार सपा पर होगा। क्योंकि यह इलाका सपा के दिग्गज आजम खां की अपनी जमीन है। नरेंद्र मोदी को नसीहत देने के अंदाज में वह आजम कुछ दिन पहले बोल भी चुके हैं-यह यूपी है गुजरात नहीं। सो, भाजपा ने ठान ली है कि वह उन्हीं के क्षेत्र में बताएगी कि गुजरात के मुसलमान तरक्की की पायदान पर कितने आगे हैं। समझाने वाले मोदी के अति करीबी अमित शाह होंगे तो लोगों को जुटाने का काम करेंगे पार्टी का मुस्लिम चेहरा मुख्तार अब्बास नकवी। ऐसे में स्पष्ट है, भाजपा इस बार पश्चिम से ही अपनी सियासी हवा को पछुआ सरीखा बनाएगी। इस रणनीति में उसे पांच से छह फीसद भी सफलता मिली तो यहां भाजपाई तासीर अलग होगी, जिसकी शुरुआती तस्वीर 29 मई को रामपुर में अमित शाह के आने पर दिखेगी।