19 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
सीरिया में अब दुनिया कराएगी घमासान
29-05-2013

मॉस्को। सीरिया में गृह युद्ध शुरू हुए दो साल से अधिक गुजर जाने के बाद भी शांति नहीं आई है। अब दुनिया की दो धुरियों रूस और अमेरिका समर्थित ईयू ने सीरिया को राजनीतिक समाधान के बजाय खून से रंगने की पूरी तैयारी कर ली है। एक ओर रूस ने अपने पुराने दोस्त राष्ट्रपति बशर अल असद को मिसाइलें देने का फैसला लिया है, वहीं यूरोपीय यूनियन (ईयू) ने विद्रोहियों को हथियार देने का रास्ता साफ कर दिया है। सोमवार को अमेरिकी सीनेटर जॉन मैकेन के सीरिया के सीमावर्ती शहर बाब-अल-सलाम में जाकर विद्रोही लड़ाकों के जनरल सलीम इदरीशी व अन्य नेताओं से मिलने के बाद देश की हवा बदलने लगी थी। मंगलवार को रूस और ईयू ने इस पर मुहर लगा दी रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रेबकॉव ने बताया कि हमने विदेशी ताकतों से सीरिया को बचाने के लिए असद की सेनाओं को मिसाइल प्रणाली देने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों और इजरायल के विरोध के बावजूद हम अपने पुराने दोस्त सीरिया को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। रूस असद को लंबी दूरी का एस-300 मिसाइल सिस्टम देगा। इसकी रेंज 200 किमी तक होती है। उन्होंने कहा कि कई देशों ने इसका विरोध जताया है लेकिन हम जानते हैं कि रूस को क्या करना चाहिए। सीरिया के संबंध में हम अपने रुख में कोई बदलाव नहीं करने वाले। वहीं, ईयू ने मंगलवार को कहा कि कुछ दिनों के अंदर उसके सदस्य देश विद्रोही लड़ाकों तक हथियार पहुंचाना शुरू कर देंगे। उन्होंने कहा कि बिना हथियारों के असद की सेनाओं से लड़ना विद्रोहियों के लिए संभव नहीं है। इसके बाद ब्रिटिश विदेश मंत्री विलियम हेग ने कहा कि यह यूरोप की तरफ से असद को साफ संदेश है, उन्हें जाना होगा। ईयू के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान हथियार की सप्लाई पर चर्चा हुई थी। स्वीडन के विदेश मंत्री कार्ल बिल्ट ने कहा कि हथियारों के जरिये ही सीरिया में परिवर्तन लाया जा सकता है। रूस और ईयू के ये निर्णय बेहद चौंकाने वाले हैं। कुछ दिनों पहले ही अमेरिका और रूस ने सीरिया संकट के शांतिपूर्ण समाधान के लिए जून में जेनेवा में वार्ता आयोजित करने का फैसला किया था। असद ने इस बैठक में अपने विदेश मंत्री को भेजने का फैसला किया था। हालांकि, मंगलवार को जो परिस्थितियां बन रही हैं उसमें शांति वार्ता के जरिये रास्ता निकालने को पूरी दुनिया उत्सुक नहीं दिखाई दे रही। ब्रिटेन और फ्रांस काफी समय से ईयू पर हथियारों की सप्लाई शुरू करने का दबाव बना रहे थे।