16 February 2019



राष्ट्रीय
समतल इलाके की वजह से बचा केदारनाथ मंदिर
05-07-2013
केदारघाटी में आई तबाही ने जिस तरह बेहद घनी आबादी वाले रामबाड़ा कस्बे को जड़ से उखाड़ दिया, उसके पीछे 70 डिग्री तक का तीव्र ढलान प्रमुख कारण रहा। इससे पाना का वेग तूफान बनकर टूटा। केदारनाथ मंदिर के मुख्य हिस्से को सुरक्षित रखने में मंदिर के आसपास के समतल इलाके की बड़ी भूमिका रही। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की ओर से जारी सेटेलाइट चित्रों के अध्ययन के बाद उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) इस निष्कर्ष पर पहुंचा है। यूसैक की ताजा रिपोर्ट में ग्लेशियर के जलस्राव से लेकर केदारनाथ मंदिर, रामबाड़ा व गौरीकुंड तक के हिस्से की ढलान को ग्राफ के माध्यम से दर्शाया है। इसके मुताबिक, करीब चार हजार मीटर की ऊंचाई पर चौराबारी व कंपेनियन ग्लेशियर के जलस्राव से लेकर केदारनाथ मंदिर व आसपास के क्षेत्र तक लगभग 50 से 60 डिग्री का तीव्र ढलान है। 60 डिग्री के ढलान पर जो भवन थे, वह जमीन समेत उखड़ गए, जबकि 50 डिग्री ढाल वाले इलाकों में स्थित भवन क्षतिग्रस्त हुए। साथ ही केदारनाथ से रामबाड़ा के बीच 70 डिग्री तक की तीव्र ढलान है। ग्लेशियर से निकलकर पानी का रेला जब केदारनाथ से नीचे उतरा तो उसकी रफ्तार कई गुना बढ़ गई। जल प्रवाह के साथ आए बोल्डरों ने रामबाड़ा का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। इस तबाही के बीच केदारनाथ मंदिर का मुख्य हिस्सा सुरक्षित बच गया, क्योंकि मंदिर परिसर का ढाल 180 डिग्री यानि समतल मैदान जैसा है। यही वजह रही कि ग्लेशियर के जलस्राव की तरफ से लुढ़क कर आई एक चट्टान मंदिर के पिछले हिस्से के पास आकर रुक गई। ढलान की ये है स्थिति केदारनाथ मंदिर क्षेत्र: यहां ढलान का स्तर 50 से 60 डिग्री है। 50 डिग्री वाली ढलान पर 95 भवन क्षतिग्रस्त हुए, जबकि 60 डिग्री की ढलान वाले 55 भवन पूरी तरह उखड़ गए। रामबाड़ा: 70 डिग्री तक की ढलान ने इस हिस्से में भवन उखड़ कर जल प्रवाह के साथ बह गए। तबाही में रामबाड़ा का वजूद ही नहीं बचा। गौरीकुंड: ढलान का स्तर 30 डिग्री तक, यहां पहुंचते-पहुंचते जल प्रलय की गति काफी धीमी पड़ गई, यही वजह रही कि इस क्षेत्र में 20 फीसद तक नुकसान हआ।