18 February 2019



प्रादेशिक
एचआईवी का पता चलते ही मरीज को किया डिस्चार्ज
05-07-2013
पीपुल्स मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती पल्मोनरी ट्यूबरकुलेसिस [टीबी] से पीड़ित एक मरीज को एचआईवी पॉजीटिव पाए जाने के फौरन बाद डिस्चार्ज कर दिया गया। जबकि मरीज की हालत गंभीर थी और वह ऑक्सीजन सपोर्ट पर था। स्वंयसेवी संस्था के हस्तक्षेप के बाद मरीज को हमीदिया अस्पताल में भर्ती कराया गया। भोपाल के छोला इलाका स्थित उ़ि़डया बस्ती में रहने वाला 40 वषर्षीय मरीज पल्मोनरी टीबी से पी़ि़डत था। उसे टीबी मैनेन्जाइटिस भी थी, जिस कारण उसका तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो गया था। 1 जुलाई को गंभीर स्थिति में उसे पीपुल्स मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में उसका एचआईवी टेस्ट कराया गया, जिसमें वह पॉजीटिव आया। पी़ि़डत के एक रिश्तेदार ने बताया कि जैसे ही एचआईवी पॉजीटिव होने की रिपोर्ट आई, अस्पताल वाले उसे एचआईवी के इलाज के लिए हमीदिया अस्पताल स्थित एआरटी [एंटी रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट] सेंटर ले जाने का दवाब बनाने लगे। आनन-फानन में एक एम्बुलेंस बुलाकर मरीज को हमीदिया भेज दिया गया। पीपुल्स अस्पताल में मरीज का इलाज करने वाले डॉ. आरजी अग्रवाल का कहना है कि मरीज को एचआईवी था, उसका इलाज हमीदिया अस्पताल की एआरटी सेंटर में होता है, इसलिए यहां से भेजा गया। कॉम्पलीकेशन का इलाज पहले हमीदिया अस्पताल में एआरटी सेंटर के प्रभारी डॉ. हेमंत वर्मा का कहना है कि एचआईवी होने पर किसी मरीज को इस तरह नहीं निकाला जा सकता। अगर उसे एचआईवी के साथ अन्य कॉम्प्लीकेशन हैं, तो पहले उनका इलाज किया जाना चाहिए। एआरटी ट्रीटमेंट कोई इमरजेंसी ट्रीटमेंट नहीं होता, जिसके अभाव में मरीज की मौत हो जाए। डॉ. वर्मा बताते हैं कि अगर मरीज को टीबी हो तो पहले दो-तीन हफ्ते तक उसका टीबी का इलाज किया जाता है, उसके बाद एचआईवी का इलाज शुरू किया जाता है। उन्होंने कहा कि मरीज को ऑक्सीजन सपोर्ट से हटने तक का इंतजार करना चाहिए था, उसके बाद ही एआरटी ट्रीटमेंट के लिए भेजा जाना था। स्वंयसेवी संस्था के सतीनाथ षष़़डंगी ने कहा कि ऑक्सीजन सपोर्ट पर भर्ती मरीज को दबाव डालकर एआरटी सेंटर भेजना अस्पताल प्रबंधन की संवेदनहीनता दर्शाता है। अस्पताल प्रबंधन को कम से कम उसके स्टेबल होने तक का इंतजार करना था।