22 February 2019



राष्ट्रीय
जात न पूछो वोटर की..
12-07-2013

जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान। आज से कई सौ साल पहले संत कबीर द्वारा कहे गए इस कथन के पात्र अब बदल चुके हैं। कबीर ने इस सूत्रवाक्य से समाज को आईना दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन आज के संदर्भ में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जाति आधारित रैलियों पर उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध लगाकर राजनीतिक दलों को आईना दिखाया है। आजादी के बाद से ही देश में जाति आधारित राजनीति की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। बाद के दिनों में कई राजनीतिक दलों ने इसी मसले पर अपनी राजनीतिक गोटियां सेंकी हैं। पेश है एक नजर:

अंग्रेजी दौर

सरकारी कामकाज के लिए अंग्रेजों ने जाति का रूप संस्थागत किया। इसका सबसे अधिक लाभ उच्च जातियों को मिला। नतीजतन आजादी के बाद चार दशक तक सरकारी संस्थाओं पर उनका प्रभुत्व व नियंत्रण बना रहा।

आर्थिक ताकत

परंपरागत रूप से सत्ता तक पहुंचने में जाति व्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। इस व्यवस्था ने विभिन्न जातियों को अलग-अलग आर्थिक ताकत दी है। इस ताकत से राजनीतिक ताकत हासिल की जाती रही। उत्तर भारत के गांवों में उच्च और मंझले दर्जे की जातियों का भू-स्वामित्व पर दबदबा रहा है। वे पंचायतों के निर्णयों में संपदा की इस ताकत का इस्तेमाल करते रहे हैं। राजनीतिक लाइन भी जाति लाइन द्वारा ही निर्धारित होती रही है।

प्रभुत्व जाति

एक विशिष्ट क्षेत्र में कोई खास जाति संख्या बल और भू-स्वामित्व के लिहाज से दबदबा रखती है। स्थानीय स्तर पर वह वहां की प्रभुत्व जाति होती है। देश की राजनीतिक संरचना के हिसाब से स्थानीय प्रभुत्व बाद में क्षेत्रीय प्रभुत्व के रूप में स्थानांतरित हो जाता है। इसके चलते उस विशिष्ट क्षेत्र की कम प्रभावशाली जातियां राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए अन्य जातियों से मिलकर घेराबंदी करती हैं। वे ऐसा अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए करती हैं।

वोट बैंक

सबसे पहले कांग्रेस ने वोट बैंक राजनीति के लिए जाति का इस्तेमाल किया। बाद में विरोधी दलों ने इसे हथियार बनाया। पिछली सदी के अंतिम दशक में जाति आधारित राजनीति में बदलाव आया। अगड़ी जाति के नेतृत्व वाली कांग्रेस के रूप में सत्ता में एक दल की लगातार उपस्थिति का युग खत्म हो गया। इसके लिए आंशिक रूप से आर्थिक उदारीकरण के साथ जाति आधारित पार्टियां जिम्मेदार रहीं। इन पार्टियों ने निचली जातियों का सशक्तीकरण राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बना दिया। इनका उदय राष्ट्रीय स्तर पर तो नहीं हुआ लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर विशेष रूप से तमिलनाडु व उत्तर भारत में ये प्रभावी होकर उभरीं। इससे राजनीतिक क्षेत्र में ऊंची जातियों का प्रभुत्व खत्म हो गया। लेकिन पार्टियां वोट बैंक के लिए जाति का इस्तेमाल करती रहीं। मसलन 2006 में मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने जब उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गो को आरक्षण देने की शुरुआत की तो उनकी इसलिए आलोचना की गई कि वह जाति आधारित राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं।

मंडल कमीशन

जातियों के सामाजिक या शैक्षिक पिछड़ेपन की पहचान के लिए 1979 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने मंडल कमीशन गठित किया। इसका मकसद सीटों के आरक्षण और सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक समेत 11 बिंदुओं के आधार पर \'पिछड़ेपन\' का निर्धारण करना था। एक दशक बाद वीपी सिंह की सरकार ने इस कमीशन के सुझावों को 1989 में लागू कर दिया। नतीजतन पिछड़ी जातियों को नौकरियों में आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हो गया। यद्यपि इसकी तीखी प्रतिक्रिया भी हुई।

राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

इन सबके चलते जातियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। गोलबंदी बढ़ी। सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार बढ़ा। ताकत की चाहत के चलते नियम-कानूनों को ताक पर रखते हुए जाति आधारित माफिया नेटवर्क बनना शुरू हुआ। इस माफिया-नेटवर्क ने नए तरह से खेलना शुरू किया। इसके लिए विकास मुद्दा नहीं रहा। यह लोकतंत्र और चुनावों को महज सत्ता हथियाने का जरिया मानने लगा।

राजनीतिक गोटियां

1951 के लोकसभा चुनाव में तीन प्रमुख जातीय पार्टियों (रामराज्य परिषद, हिंदू महासभा, और भारतीय जनसंघ) ने कांग्रेस पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोला। ये तीनों ही दल अधिसंख्य हिंदुओं के समर्थन की मंशा से चुनाव में कूदे थे। वहीं पिछड़ी जातियों के भरोसे आल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन मैदान में था। पर्याप्त और वांछित समर्थन न मिल सकने के चलते इन चारों में से तीन दल धीरे-धीरे लुप्तप्राय हुए।

कांग्रेस का पराभव

बीसवीं सदी के नौवें दशक के उत्तरा‌र्द्ध में कांग्रेस का ग्राफ गिरने लगा। अधिक संख्या में गैर कांग्रेस पार्टियां इसके प्रभुत्व को चुनौती देने लगीं। भारतीय जनसंघ से टूटकर भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई। जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा.. जैसे नारों से इस पार्टी ने हिंदुओं के वोट को हथियाने की कोशिश की। इसके साथ ही बसपा और जनता दल जैसी पार्टियों ने समाज के पिछड़े और अनुसूचित वर्ग को अपना मतदाता समझा।

पिछड़ों का उभार

पिछली सदी के आखिरी दशक में सपा, जनता दल जैसी कई पार्टियों ने समाज के पिछड़े तबकों के रहनुमाई की बात कही। मूलत: पिछड़े वर्गो के समर्थन पर आश्रित ऐसी कई पार्टियों ने मुस्लिमों और दलितों के समर्थन से कई राज्यों में सरकारें भी बनाई। इसी बीच कई दलित नेताओं और चिंतकों को यह लगा कि तथाकथित अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) ही दलितों का मुख्य विरोधी है। लिहाजा बसपा और इंडियन जस्टिस पार्टी जैसी पार्टियां बनीं। राजनीतिक सफलता के लिए महाराष्ट्र में कांग्रेस ने ओबीसी के समर्थन को मूल मंत्र माना। वहीं भाजपा ने भी अगड़ों की पार्टी का ठप्पा छुड़ाने के लिए दलित और ओबीसी मतदाताओं को लुभाने के लिए बंगारू लक्ष्मण के रूप में दलित को पार्टी अध्यक्ष बनाया तो उमा भारती को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री पद सौंपा।

--------

*** निश्चित रूप से इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उपयुक्त है। यह बात बहुत पहले साफ हो जानी चाहिए थी। हमारे संविधान में कहीं भी जाति की बात नहीं कही गई है उसमें क्लास (वर्ग) की बात कही गई है। राजनीतिक दलों की यह कार्यशैली संविधान की मूलभावना के ही खिलाफ थी। जब लोगों को मताधिकार मिला तो उसमें कोई भेदभाव नहीं किया गया था जबकि कई तथाकथित अगड़े देशों में इस अधिकार के लिए तमाम शर्ते लगाई गई थी। लोगों ने इस अधिकार की कद्र भी की। देश दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र बनकर उभरा है। देश में विकेंद्रीकरण जैसी कई प्रक्रियाओं की दुनिया सराहना करती है। ऐसे में समाज को जाति और धर्म में बांटने वाली हरकत निश्चित रूप से निंदनीय है। हमें संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना होगा। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि तमाम सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर भी चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है। उन्हें इस फैसले की कद्र करनी चाहिए। इसका विकल्प नहीं तलाशना चाहिए। -आश नारायण रॉय (निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, दिल्ली)