24 February 2019



अंतरराष्ट्रीय
लाहौर में हिंदुओं के लिए कोई शमशान घाट नहीं
19-08-2013
लाहौर में रहने वाले हिंदू-सिखों को दाह-संस्कार शब्द किसी अभिशाप की तरह प्रतीत होता है। मौत के बाद अपने सगे-संबंधी का दाह-संस्कार करने के लिए दुख की घड़ी में उन्हें शव को लेकर 86 किमी का सफर तय करना पड़ता है। इतिहासकार सुरेंद्र कोछड़ ने बताया कि 1947 से पहले लाहौर के मॉडल टाउन, टकसाली गेट, बक्कर मंडी, इशरा और कृष्णा नगर आदि क्षेत्रों में हिंदुओं के 11 शमशान घाट थे, परंतु आज उन पर रिहायशी कालोनियां और प्लाजा बन जाने के कारण एक भी शमशान घाट मौजूद नहीं है।

लाहौर में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं को अपने मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। अगर लाहौर में किसी हिंदू की मौत होती है तो उसके परिजनों को उसकी मौत के दुख से अधिक यह बात तकलीफ देती है कि वे शव का अंतिम संस्कार कहां और कैसे करेंगे? अगर वे अंतिम संस्कार लाहौर में रावी दरिया के किनारे करते हैं तो प्रशासन मना कर देता है। उनके अनुसार ऐसा करने से वहां के मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है। ऐसी सूरत में सांप्रदायिक फसाद होने का खतरा बढ़ जाता है। वहां के हिंदुओं को अंतिम संस्कार करने के लिए मृतक देह को लेकर 86 किलोमीटर का सफर तय करके जिला ननकाना साहिब जाना पड़ता है।