22 February 2019



राष्ट्रीय
दृष्टिहीन अध्यापक दे रहा 'सृष्टि' को दृष्टि
25-08-2013
जिला मुख्यालय से तीस किलोमीटर दूर बसा है सुंडावास गांव। आबादी साढ़े चार हजार, मगर गांव आज विश्व पटल पर है। यहां माध्यमिक दर्जे के एक दृष्टिहीन स्कूली शिक्षक ने स्वच्छता का ऐसा संकल्प लिया कि उसकी खुशबू सात समंदर पार अमेरिका तक फैल गई। आलम यह कि स्वच्छता के परिप्रेक्ष्य में आयरलैंड, नेपाल व बर्मा जैसे मुल्क भी \'सुंडावास मॉडल\' की ओर आकर्षित हो रहे हैं। एक दृष्टिहीन शिक्षक \'सृष्टि\' को स्वच्छता की \'दृष्टि\' दे रहा है। स्वच्छता का सुंडावास मॉडल देने वाले गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल के दृष्टिहीन शिक्षक कुलदीप आजाद की दास्तां बड़ी प्रेरक है। हुआ यूं कि ढाई साल पहले जिला ग्रामीण विकास अभिकरण की टीम ने संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत सुंडावास गांव का दौरा किया। गांव में शायद ही कोई गली थी जहां गोबर अथवा मनुष्य का मल न रहा हो। टीम ने सरपंच को बुलाया और गंदगी पर तंज कसे तो वहां मौजूद ग्रामीणों ने शर्म से नजरें झुका लीं। अब डीआरडीए की टीम ने हर गली घूम नहीं पाने का बहाना बताते हुए गांव का नक्शा रंगों से भरने को कहा। सफेद रंग गांव की सीमा, लाल रंग कम्यूनिटी सेंटर और हरा रंग घरों के लिए दिया गया। उन्हें पीले रंग से गंदगी वाले क्षेत्र को रंगने के लिए कहा गया। संपूर्ण नक्शा पीले रंग से भर गया।

ग्रामीणों को गांव की दयनीय दशा का हुआ अहसास :-

गांव वालों की इस भीड़ में एक दृष्टिहीन शिक्षक सब कुछ सुन रहा था। वह आगे बढ़ा और सरकारी टीम से पूछ बैठा, \'किस तरह के प्रयास किए जाएं\'? टीम ने उसे जागरूकता से कायाकल्प की सलाह दी। वह भी तो शिक्षक ठहरा। सो, जागरूकता का पाठ सारे स्कूली छात्रों को पढ़ा गया। छठी कक्षा की सपना ने तो घर जाकर मम्मी-पापा से दो टूक कह दिया, \'जब तक टायलेट नहीं बनाते वह स्कूल नहीं जाएगी\'। दसवीं में पढ़ने वाली प्रियंका कहती है कि कुलदीप सर की प्रेरणा से गांव की साफ-सफाई की ललक बढ़ती ही चली गई। छात्र-छात्राएं ही क्यों? मलेरिया व अन्य जलजनित बीमारियों से छुटकारा पाकर प्रौढ़ रोहताश भी तो एहसानमंद हो रहा मास्टरजी का।