16 February 2019



राष्ट्रीय
गरीबों के बूते के बाहर हुई खर्चीली कानूनी लड़ाई
25-08-2013

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया है कि वर्तमान में मुकदमा लड़ना बेहद महंगा हो गया है। इसके चलते इंसाफ की जंग के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना गरीबों के बूते की बात नहीं रह गई है। शीर्ष न्यायालय का साफ कहना है कि केस दायर करने की खर्चीली प्रक्रिया के कारण कानूनी लड़ाई लड़ना गरीबों की पहुंच से दूर हो गया है। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक पेशे के व्यवसायीकरण पर गहरी चिंता जताई है। न्यायमूर्ति बीएस चौहान एवं एसए बोब्दे की पीठ ने यह टिप्पणी की है। न्यायपालिका का आईना दिखाने वाली अपनी टिप्पणी में पीठ ने धीमी न्यायिक प्रक्रिया पर भी गहरा असंतोष व्यक्त किया। शीर्ष अदालत का कहना था, \'न्यायिक प्रक्रिया इस कदर धीमी है जिससे आम लोगों में यह धारणा घर कर गई है कि उनकी जिंदगी में शायद में ही उन्हें इंसाफ मिले। कोई ज्योतिषाचार्य भी यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि आम आदमी को कब तक न्याय मिल पाएगा।\' पीठ के अनुसार, \'न्यायिक पेशे को कभी बेहद पवित्र माना जाता था, लेकिन वर्तमान में इसका व्यवसायीकरण हो गया है। इससे इंसाफ की लड़ाई गरीबों के साम‌र्थ्य के बाहर हो गई है। भारी-भरकम फीस चार्ज करने वाले वकीलों को नसीहत देते पीठ ने कहा, \'न्याय प्रदान करने की राह में जज के साथ वकील भी बराबर के भागीदार हैं। लिहाजा अधिवक्ताओं का यह कर्तव्य है कि वे मुश्किल में फंसे हुए शख्स को राहत दिलाएं न कि उनका शोषण करें।\' शीर्ष अदालत के अनुसार, \'कानून व्यापार नहीं है और इसके जरिये किसी व्यावसायिक सामग्री की व्याख्या नहीं की जाती है।\' सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे वकीलों के व्यवहार पर नाराजगी जाहिर की है जो सबसे पहले केस लड़ने आए मुवक्किल को फंसाते हैं और बाद में उसके केस को किसी अन्य वकील के हवाले कर देते हैं। अदालत ने कहा कि मुवक्किल फंसाने वाले वकीलों की यह हरकत अस्वीकार्य है और न्यायिक पेशे की नैतिकता के खिलाफ है। पीठ ने यह टिप्पणी एक ऐसे वकील को फटकार लगाते हुए की, जिसने मुकदमा तो दायर किया लेकिन जिरह करने के लिए केस के दौरान कभी उपस्थित नहीं हुआ।