18 February 2019



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आसाराम का इंदौर से दिल्ली तक का सफर
02-09-2013
फ्लाइट एआई 635 से। इंदौर के आसमान पर रविवार की सुबह हलके बादल थे। बरसात.. और शायद आसाराम को विदाई देते से। यूं तो इंदौर एअरपोर्ट पर रात को ज्यादा सरगर्मी नहीं होती, लेकिन ये रात कुछ अलग थी। आसाराम के लिए बहुत लंबी। फूलों से सजी कुटिया और सेज पर विराजने वाले आसाराम एअरपोर्ट के सोफे पर कागज बिछाकर सुबह का इंतजार कर रहे थे। जोधपुर पुलिस के अफसर भी बेचैनी से घ़़डी को ताकते, जरूरी हिदायतें देते एअर इंडिया की फ्लाइट एआई 635 के डिपार्चर का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।

सुबह पांच बजे से ही यात्री एअरपोर्ट पहुंचने लगे थे। लोगों को डर था कि आसाराम को लेकर एअरपोर्ट पर ज्यादा सिक्योरिटी होगी। लेकिन घ़़डी की सुइयां अपनी रफ्तार नहीं बदलतीं। इंतजार का सिलसिला लंबा था.. सात बजे के लगभग बोर्डिग के लिए एनाउंसमेंट होना शुरू हुआ तो एअरपोर्ट पर हर निगाह सिर्फ आसाराम की तलाश कर रही थी। उनके हमसफर कुछ लोग इत्तफाक से थे और कुछ जानबूझकर। मसलन मीडिया के लोग और बापू के एक दर्जन भर समर्थक।

पिछले दरवाजे से प्लेन में दाखिल

प्लेन का सिर्फ अगला गेट यात्रियों के खोला गया था। पैसेंजर प्लेन में सवार हुए, सबके चेहरे पर एक ही सवाल लिखा था.. आसाराम कहां हैं। इसी गफलत में न जाने कब प्लेन के पिछले गेट से जोधपुर पुलिस के एडिशनल एसपी सतीश चंद्र समेत छह पुलिसकर्मी आसाराम को लेकर दाखिल हुए। प्लेन में हलचल शुरू हो गई। सब पैसेंजर्स सीट छो़़डकर ख़़डे हो गए। निगाहों का एक ही निशाना था-आसाराम।

पीछे बैठे, फिर पीछा न छूटा

आसाराम के लिए खिड़की की सीट 27 एफ तय थी। उसके बाद दो पुलिस अधिकारी। एअर इंडिया से पुलिस ने खास अनुरोध किया था कि आसाराम को ले जाने वाली टीम को पीछे की कतार में सीट दी जाए। साथ ही उनकी सीट के आगे और पीछे यात्रियों को न बिठाया जाए। लेकिन फिर भी इक्का- दुक्का सीट्स एलॉट हो गई थीं। मीडिया के कुछ लोग भी अपनी सीट छो़़डकर खाली सीटों पर आ जमे। मैं भी..

कप्तानी निर्देश का पालन

तभी प्लेन के कप्तान की आवाज गूंजी.. वेलकम और गुड मार्निग जैसे प्रोफेशनल शब्दों के साथ, जो शायद आसाराम को बिल्कुल पसंद नहीं आए होंगे। यही तो वो घ़़डी थी, जिससे बचने के लिए वे भागे फिर रहे थे। सीट बेल्ट्स बांधने के एनाउंसमेंट के साथ आसाराम ने मशीनी रफ्तार से हिदायत का पालन किया.. शायद पिछले चंद घंटे में वह समझ चुके थे कि अब निर्देशों और नियमों का पालन करने की आदत उन्हें डालनी होगी।

तयशुदा समय पर प्लेन ने परवाज भरी, आसाराम की आंखें बंद थीं.. होंठ कुछ बुदबुदा रहे थे शायद राम नाम.. शायद हरी-ओम। ऐसे ही लमहों में तो ऊपर वाले की याद ज्यादा आती है। प्लेन आसमान में अपनी ऊंचाई नाप चुका था, आसाराम पतन की..

सवालों की बौछार

सीट बेल्ट से आजादी मिलते ही मीडियाकर्मी लपक प़़डे। कैमरे ऑन.. झमा-झम फ्लैश. दना-दन सवाल। बापू आप अब क्या करेंगे, बापू आपकी गिरफ्तारी में किसकी साजिश है, आप जमानत की अर्जी कब डालेंगे.. अक्सर आंखें दिखाने वाला, बरस प़़डने वाला 72 साल का ये शख्स सूनी आंखों से, कातर नजरों से बस निहार रहा था। चेहरे से टपकती थकान, रातभर की नींद के बोझ से सूजी आंखें, चेहरे पर उम्र की झुर्रियों से ज्यादा नुमाया चिंता की लकीरें.. कितने लाचार लग रहे थे आसाराम।

बंदिशें बेअसर

पुलिस अफसरों ने मीडिया के बीच आने की कोशिश की, एअर होस्टेस भी लपकीं। लेकिन सवाल मानो किसी बंदिश को मानने के लिए तैयार नहीं थे। ऐसी ही किसी स्थिति से निपटने के लिए तो आसाराम के दर्जनभर समर्थक यात्री के तौर पर सफर कर रहे थे। वे बीच में कूद प़़डे.. झ़़डप सी होने लगी। खबर कॉकपिट तक पहुंची। कप्तान ने सबको सीट पर बैठने, सीट बेल्ट्स बांधने की हिदायत दी.. अमूमन टेकऑफ और लैंडिंग के अलावा मौसम खराब होने पर ये हिदायत दी जाती है। कप्तान समझ रहे थे कि बाहर का मौसम तो ठीक है, लेकिन तूफान तो अंदर मचा है..

आसाराम की शांति अपील

आसाराम बोल ही प़़डे, शांति रखिए। सब अच्छा होगा। मैंने किसी का बुरा नहीं किया.. मेरा बुरा कैसे हो सकता है। भगवान पर यकीन रखिए.. न जाने वो अपने समर्थकों को समझा रहे थे या खुद को। मीडिया के कभी न खत्म होने वाले सवालों की बौछार चलती रही और कप्तान की सीट्स पर बैठने की गुहार भी.. जो इत्तफाक से आसाराम के हमसफर थे, फोन के कैमरे ऑन कर तस्वीरें उतार रहे थे, वीडियो बना रहे थे। शायद इसलिए कि लौटने पर सबूत के साथ लोगों को बता सकें कि वे ऐतिहासिक उ़़डान से पहुंचे हैं।

अपने-अपने आकलन और अंदेशे

आसाराम ने आंखें मूंद ली थीं। फ्लाइट के मुसाफिरों की आपसी चर्चा उनके कानों तक पहुंच रही थी। बस एक ही सब्जेक्ट। आसाराम। कोई साथ बैठे मुसाफिर से पूछ रहा था, क्या इन्हें जेल में डाल देंगे। कोई कह रहा था, यार अगर खुद ही जोधपुर चले जाते, तो तमाशा तो न बनता। सवालों ने फिर ज्यादा कुरेद दिया, छू लिया तो फिर बोल पडे़-मैं अभी कुछ नहीं कहूंगा। बाद में बात करूंगा। फिर आंखें मूंद लीं, होठ फड़क रहे थे। आसाराम को देखने के लिए उत्सुकता फिर भी बनी रही। लोग सीट से उठकर टॉयलेट के बहाने जहाज के पिछले हिस्से की तरफ चल देते। आखिरकार कप्तान ने एलान किया कि थो़़डी देर के लिए प्लेन के पिछले टॉयलेट का इस्तेमाल न किया जाए..

ध्यान दीजिए, दिल्ली पहुंच गए हैं..

दिल्ली के आसमान पर प्लेन पहुंचा। लैंडिंग के जरूरी हिदायतें जारी होने लगीं। नौ बजकर पांच मिनट पर फ्लाइट लैंड की। आसाराम और पुलिस अधिकारी सीट से हिले नहीं। पहले बाकी मुसाफिरों को विमान से उतारा गया। उसके बाद बैटरी कार में आसाराम को बैठाकर पुलिस अधिकारी आईजी एअरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में ले गए। दिल्ली में इंदौर के मुकाबले पुलिस ज्यादा चुस्त थी। सीआईएसएफ और दिल्ली पुलिस ने क़़डे सुरक्षा इंतजाम किए थे। फिर भी आसाराम को पुलिस की हिरासत में एक झलक देख लेने की मारा--मारी मची थी। पौन घंटा वीआईपी लाउंज में गुजारा। इसके बाद जोधपुर की फ्लाइट के लिए एनाउंसमेंट शुरू हुआ और कटघरे की तरफ आसाराम का अंतिम सफर भी..

अन्न त्याग दूंगा.. और पिया गिलास भर दूध

शनिवार को आसाराम ने कहा था कि अगर पुलिस ने गिरफ्तार किया, तो अन्न-जल त्याग दूंगा। प्राण छो़़ड दूंगा। लेकिन पुलिस हिरासत में आए, तो समझ आया कि हालात का मुकाबला खाली पेट नहीं होगा। आसाराम ने गिलास भर दूध पिया। आईजी एअरपोर्ट पर उन्हें कुछ खाने-पीने के लिए मुहैया कराया गया।

नारायण साई को नहीं मिली इजाजत

आसाराम के बेटे नारायण साई को उनके साथ जाने की इजाजत पुलिस ने नहीं दी। इसी के चलते वह इंडियन एअरलाइंस की उस फ्लाइट से न आ सके, जिसमें उनके पिता थे। वह बाद में इंडिगो की फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे और फिर वहां से जोधपुर के लिए रवाना हुए।