16 February 2019



राष्ट्रीय
आलोचना ही नहीं समाधान के फार्मूले भी
13-09-2013
बीते नौ महीनों में नरेंद्र मोदी ने भी काफी चतुराई से अपने को राष्ट्रीय मुद्दों की बहस में शामिल किया है। गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक दर्ज करने के बाद केंद्र सरकार की आलोचना में मोदी के सुर तीखे हुए तो साथ ही उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि उनके बयानों में सिर्फ शिकायत न हो। समाधान की भी बात हो।

विकास के वैकल्पिक मॉडल और समस्याओं को सुलझाने के लिए अपना फार्मूला बताने का मोदी ने कोई मौका नहीं चूका। नामचीन कॉलेज के सभागार से लेकर सोशल मीडिया के प्लेटफार्म तक और देहाती चौपाल से लेकर कारपोरेट संगठनों तक मोदी एक सूबे के मुख्यमंत्री की बजाय राष्ट्रीय नेता के तौर पर अपने विचारों की मार्केटिंग करते रहे हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर मोदी की हालिया टिप्पणियों की एक बानगी-

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अर्थव्यवस्था -नीतिगत लकवे से छुटकारे की जरूरत है। मैं मानता हूं कि सही फैसलों से हम अर्थव्यवस्था में एक बार फिर विश्वास और उम्मीद जगा सकते हैं।

- प्रधानमंत्री कहते हैं, पैसे पेड़ पर नहीं उगते। लेकिन यदि सही फैसले किए जाएं तो खेतों और कारखानों में पैसे उग सकते हैं।

-कालेधन ने देश में समानांतर अर्थव्यवस्था बना दी है, जिसने आम आदमी के लिए रीयल एस्टेट के क्षेत्र में निवेश को कठिन बना दिया है।

विदेश नीति : -केंद्र सरकार पाकिस्तान के अमानवीय कृत्यों का जवाब देने में नाकाम रही है। भारतीय सैनिकों का सिर कलम और सरबजीत की मौत इसका नमूना है।

-यह मुश्किल वक्त है। चीन हमारी सरहदों में घुस रहा है, पाकिस्तान हमारे सैनिकों को मार रहा है और केंद्र कुछ नहीं कर रहा। केंद्र सरकार कब जागेगी?

रेलवे : -रेलवे बजट विकास विरोधी है जो सरकार की नाकामी बताता है। यह आम आदमी पर कीमतों का बोझ बढ़ाएगा।

-रेल बजट में सरकार ने एक बार फिर भारत के बंदरगाहों को रेल नेटवर्क से जोड़ने का मौका गंवा दिया। इससे हमें विश्व अर्थव्यवस्था में मजबूती से खड़ा होने का मौका मिलेगा।

नक्सलवाद : - छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं पर हुए क्रूर नक्सली हमले के बाद अब वक्त आ गया है हम नक्सलवाद को कतई बर्दाश्त न करने की नीति अपनाएं।

आतंकवाद : -सरकारी एजेंसियों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की केंद्र की नीति आतंकवाद और माओवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई को कमजोर कर रही है।