15 February 2019



राष्ट्रीय
खाद्य सुरक्षा: राज्य तय करेंगे गरीबों की तादाद
16-09-2013
चुनावी लाभ की चाहत में केंद्र की संप्रग सरकार ने भले ही आनन-फानन खाद्य सुरक्षा कानून ला दिया हो, लेकिन गरीबों की संख्या का निर्धारण न हो पाने का उल्टा असर उस पर भारी पड़ सकता है। सरकार ने अब इससे बचने का रास्ता तलाश लिया है। तभी तो खाद्य सुरक्षा के लाभार्थी उपभोक्ताओं को चिन्हित करने का दायित्व राज्यों पर छोड़ दिया गया है।

सामाजिक-आर्थिक व जातिगत जनगणना के पूरा होने में अभी और समय लगेगा। इससे जिन उपभोक्ताओं को अति रियायती दर वाला अनाज दिया जाना है, उनकी सूची तैयार नहीं हो पाएगी। ऐसे में कई राज्य सरकारें अपने यहां खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने में असमर्थ हैं। शहरी क्षेत्रों में 50 और ग्रामीण क्षेत्रों में 75 फीसद आबादी को एक रुपये में मोटा अनाज, दो रुपये में गेहूं और तीन रुपये में एक किलो चावल देने का प्रावधान है।

मौजूदा राशन प्रणाली का लाभ गरीबी रेखा से नीचे और ऊपर वाले उपभोक्ताओं को मिलता है। लेकिन इस कानून के तहत 67 फीसद आबादी को इसका फायदा मिलेगा। योजना आयोग की सिफारिशों के आधार निर्धारित गरीबों की संख्या के लिए ही अनाज मुहैया कराया जाता है। लेकिन नई व्यवस्था में केंद्र की कोई सूची उपलब्ध नहीं होने से खाद्य सुरक्षा कानून की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। इसीलिए अब यह जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ने का फैसला किया गया है।

राज्यों के चिन्हित उपभोक्ताओं की संख्या के आधार पर ही केंद्र गेहूं व चावल का कोटा जारी करेगा। सूत्रों के मुताबिक खाद्य मंत्रालय के आला अफसरों ने कानून बनाने से पहले ही उपभोक्ताओं की संख्या को लेकर मंत्रालय को आगाह किया था। लेकिन राजनीतिक दबाव में अफसरों ने चुप्पी साध ली थी। उपभोक्ताओं की संख्या, अनाज का आवंटन और वितरण प्रणाली को लेकर संशय बरकरार है।

इन्हीं चुनौतियों को सुलझाने के लिए राज्यों के खाद्य मंत्रियों व सचिवों से विचार-विमर्श होना है। अक्तूबर के पहले सप्ताह में आयोजित बैठक में इस पर आम राय बनाने की कोशिश होगी। चुनाव की घोषणा और आचार संहिता लागू होने से पहले ही सरकार इसका रास्ता ढूढ़ लेना चाहती है।