15 February 2019



राष्ट्रीय
दंगों लेकर यूपी सरकार पर कसा अदालती शिकंजा
17-09-2013
उत्तर प्रदेश के दंगों को लेकर प्रदेश सरकार और सपा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। अदालतों की सक्रियता सरकार की नई मुसीबत है जबकि इंटेलीजेंस ब्यूरो की रिपोटर्ें सरकार की सुस्ती ही नहीं राज्य के मंत्री व अफसरों की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा कर रही हैं। मंगलवार को उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सपा सरकार के दौरान हुए सभी दंगों पर सरकार से जवाब तलब किया है, दंगा पीड़ितों के राहत प्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले से ही सुनवाई कर रहा है। दंगों में प्रदेश के निजामी की ढिलाई को रेखांकित करने वाली आइबी की ताजा रिपोर्ट अगर अदालत पहुंची तो सरकार की आफत और बढे़गी। इस बीच मुजफ्फरनगर में राजनीतिक दिग्गजों की आवाजाही सरकार पर दबाव को दोगुना कर रही है। दंगों जातीय संघर्ष या अन्य दलों की करतूत बता रही सरकार अब बचाव की मुद्रा में है। बुधवार को विधानसभा सत्र का दूसरे दिन, सरकार पर विपक्ष के हमले और तेज हो सकते हैं।

अदालतों के सवाल : इलाहाबाद च्च्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा और अरविन्द कुमार त्रिपाठी की बेंच ने सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर की याचिका पर सपा सरकार में हुए सभी दंगों पर दो सप्ताह में जवाब मांगा है। रच्च्य के अपर महाधिवक्ता को सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद बेंच में दंगों के संबंध में दायर मुकदमों की स्थिति से भी अवगत कराने को कहा है। याचिका में मौजूदा सरकार और उसके अधिकारियों पर एक समुदाय के प्रति झुकाव और अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई में शिथिलता बरतने का आरोप है। याची ने दंगों की जांच के लिए गठित विष्णु सहाय आयोग में च्च्च न्यायालय के वर्तमान जज को भी शामिल करने की मांग की है। उधर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दंगों पर केन्द्र व रच्च्य सरकार से जवाब तलब कर रहा सुप्रीम कोर्ट ने शुक्त्रवार को फिर सुनवाई करेगा। इस दौरान केंद्र सरकार का पक्ष महत्वपूर्ण होगा।

आइबी की रिपोर्ट : दंगों पर इंटेलीजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट में कहा गया है कि मुजफ्फरनगर का दंगा रुक सकता था, लेकिन सरकार ने ही पुलिस प्रशासन के हाथ बांध दिए थे। अलर्ट के बावजूद सम्बंधित इलाकों में न तो फोर्स बढ़ाई गयी और न कोई एक्शन प्लान बना। आइबी सूत्रों के मुताबिक कवाल के तिहरे हत्याकांड के बाद यदि निष्पक्ष कार्रवाई होती तो बवाल नहीं बढ़ता, लेकिन सरकार में नंबर दो की हैसियत वाले एक मंत्री ने पुलिस प्रशासन को कार्रवाई न करने के निर्देश दिए थे। इस संदर्भ में गृह सचिव कमल सक्सेना का कहना है कि आइबी ने क्या रिपोर्ट भेजी यह नहीं मालूम है, लेकिन शासन से त्वरित कार्रवाई के निर्देश हमेशा दिए गये हैं और इसका शासनादेश भी जारी है। केंद्र आइबी की रिपोर्ट को कोर्ट में पेश कर सकता है। केंद्रीय गृह रच्च्य मंत्री आरपीएन सिंह ने तो दो टूक कह चुके हैं केन्द्र ने रच्च्य को अलर्ट कर दिया था, लेकिन कोई कारगर कार्रवाई नहीं हुई।

सियासी पैंतरे : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मुजफ्फरनगर दौरे के और रच्च्य सरकार को निशाने पर लेने के बाद दूसरे दलों के भी तेवर बदल गये हैं। जबकि सदन में सरकार के रक्षा कवच रहे मंत्री आजम खां की नाराजगी दूसरी बडी मुसीबत है। आजम खुद पश्चिम के दंगे को गुजरात से भी बड़ा दंगा कह चुके हैं। भाजपा और सपा पर हमलावर रहीं, बसपा सुप्रीमों मायावती ने पश्चिम के दंगों के लिए सिर्फ सपा सरकार को जिम्मेदार ठहराकर साफ संकेत दे दिया कि अब निशाने पर सिर्फ समाजवादी पार्टी की सरकार है। मायावती बर्खास्तगी की मांग को तेज करने वाली हैं। मुजफ्फरनगर में सियासी गतिविधियां, बुधवार को सदन में सरकार के लिए परेशानी का सबब होगी। पश्चिम उत्तर प्रदेश को लेकर भाजपा भी आक्रामक रणनीति तैयार कर रही है। मंगलवार को दिल्ली में पार्टी की शीर्ष बैठक में इस चर्चा हुई है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी वह मुजफ्फरनगर के पूर्व एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे को निलंबित करने और शामली के पूर्व एसपी अब्दुल हामिद के निलंबन न होने पर सीधे-सीधे मंत्री आजम खां को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

अब गांवों के लिए बना रहे एक्शन प्लान

सूबे के सभी जिलों में दंगा निरोधक योजना बनी है, लेकिन अब उसका फोकस गांवों पर है। पुलिस महानिदेशक देवराज नागर ने इसे प्रभावी बनाने के लिए हिदायत दी है। उन्होंने गांवों में त्वरित कार्रवाई के लिए एक्शन प्लान तैयार करने को कहा है और पुलिस अधीक्षकों से लेकर थानेदारों तक की जवाबदेही तय की है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में दंगा फैलने के बाद पुलिस को नियंत्रण में काफी मशक्कत करनी पड़ी। सर्वाधिक दिक्कत हुई कि ग्रामीणों से न तो अफसरों की कोई पहचान थी और न ही ग्रामीणों की भीड़ अफसर को कुछ समझने को तैयार। हालात पर काबू पाने को पूरी फोर्स गांवों में लगानी पड़ी और बवाल बढ़ने के बाद सिर्फ मुजफ्फरनगर में ही 547 फिक्स पिकेट और 535 मोबाइल वैन लगानी पड़ी। हर मोबाइल वैन को तीन-तीन गांवों की जिम्मेदारी दी गयी। नागर ने इससे सबक लेते हुए जिलों के एसपी, सीओ और थानाध्यक्ष स्तर पर संवाद बनाने और इसमें ग्रामीणों को भी शामिल करने के निर्देश दिए हैं। इस समन्वय के जरिए पुलिस के सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ाते हुए डीजीपी ग्रामीणों और पुलिस के बीच का गैप दूर करना चाहते हैं। यह मकसद अभिसूचना तंत्र को विकसित करने के लिए है, ताकि सही समय पर सटीक जानकारी उपलब्ध हो सके। एडीजी/आइजी कानून-व्यवस्था राजकुमार विश्वकर्मा ने इस सिलसिले में पूछे जाने पर बताया कि योजना तो सभी जिलों में लागू है, लेकिन समय और जरूरत के हिसाब से उसकी समीक्षा होती है। नई चुनौतियों के हिसाब से हम अपना एक्शन प्लान तैयार करते हैं। कास्ट और कम्युनल डिस्टर्बेस के त्वरित समाधान के लिए हमारी फोर्स पूरी तरह तैयार है। हम उसे अतिरिक्त संसाधन मुहैया करा रहे हैं।